गुरुवार, 28 मई 2020

मुरैना जिले की लोक देवियॉं-मत, मान्यता और परम्परा


संक्षेपिका-मानव की सांस्कृतिक क्षमता का रहस्य उसकी जैविक रचना में निहित है। जब किसी संस्कृति के आधारभूत मूल्य किसी समाज के बहुसंख्यक वर्ग को प्रेरित करना बन्द कर देते हैं, तो क्रमश: संस्कृति का अवसान हो जाता है, लेकिन अगर ये मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संवाहित होते रहते हैं, तो संस्कृति वैयक्तिक संवृद्धि का साधन तो बनी ही रहती है, यह सामाजिक व्यवस्था को जीवंतता भी प्रदान करती रहती है। यह बड़े गर्व की बात है कि पौरस्त्य संस्कृति का अस्तित्व अभी भी यथावत बरकरार है, क्योंकि आज भी इसके मूलभूत मूल्यों को समाज की स्वीकृति प्राप्त है, लेकिन अधुनातन भारतीय संदर्भ में अगर लोक संस्कृति की बात की जाए तो यह धीरे-धीरे विलुप्ती की कगार की ओर अग्रसर है। हमारे चारों ओर पनपते जा रहे भौतिक एवं पाष्चात्य सभ्यता के वातावरण के कारणवह क्षीण होती जा रही है । इस समय ऐसे षोधकार्यों की महती आवष्यकता जो भारतीय संस्कृति में उपस्थित लोक जीवन की संस्कृति को उजागर कर सके और उसे संरक्षित कर सके। ताकि उन्हें हम अपनी आगामी पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर पाएॅं। 
भारतीय संस्कृति में पर्वों, परम्पराओं, देवताओं, देवियों की प्राचीन मान्यताओं, अनुष्ठानों की एक अपनी महत्ता है। इसमें देवीय मान्यताओं को लोक में अपनाना या उसका अनवरत प्रवाह होना भारतीय संस्कृति का अध्यात्मिक पक्ष है। लोक देवी-देवताओं के प्रति हमारी धार्मिक आस्था जो प्राचीन मान्यताओं के आवरण में अपने को लपेटे हुए होती है, वही उस लोक के जनमानस में एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करती है। कुछ ऐसे स्थान होते जहॉं पहुॅंचकर मनुष्य अपनी सतत् आपाधापी की जिंदगी में कुछ समय के लिए राहत महसूस करता है। इसे हम यॅू भी कह सकते हैं कि धार्मिक आस्थाएॅं, मान्यताएॅं और विष्वास, चिलचिलाते धूप भरे रास्ते पर बीच-बीच में लगे एक छायादार वट वृक्ष हैं। जो कि उसके स्मरण मात्र से परेशान हारे थके राहगीर को कुछ समय के लिए आराम प्रदान करता है, शुकून देता है और नकारात्मक ऊर्जा को डायनामों की भॉंति सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर व्यक्ति को आत्मविश्वास से आपूरित कर देता है। मैं इस लेख के अंतर्गत जो प्रस्तुत करने जा रहा हूॅं, वह विशाल भारतीय संस्कृति सागर की एक बॅूंद के बराबर है, लेकिन उसकी अपनी एक उपादेयता है, क्योंकि कंुभ में जाने वाली एक-एक बॅूंद उस कुंभ को पानी से सराबोर कर देती है। हमारे देश में लोक देवियों की कई मान्यताएॅं प्रचलित हैं, जो कि जनकल्याण से जुड़ी हुई हैं। मुरैना जिले मंे भी कई लोक देवियों सम्बन्धी जन-मान्यताएॅं हैं, जो कि यहॉं की संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। आइए जाने मुरैना जिले की लोक देवियों और उनसे सम्बन्धित प्राचीन मान्यताओं के बारे में)-
     जिला मुरैना अपनी चंबल क्षेत्रीय संस्कृति, ऐतिहासिकता और लोक परम्परा के कारण सर्वप्रसिद्ध है। कहा जाता है कि महान स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद विस्मिल का भी जन्म तोमर वंष के अंतर्गत मुरैना जिले के एक छोटे से गॉंव वरवई में हुआ था। इसके अलावा इस जिले की एक तहसील अंबाह में स्थापित शैव (ककनमठ) मंदिर, जिसे शनि की जन्मस्थली भी कहा जाता है। अपनी ऐतिहासिकता, अर्वाचीनता और पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
     चंबल क्षेत्रीय भू-भाग मुरैना ब्रज क्षेत्र के अलावा बुंदेलखण्ड तथा राजस्थान से भी प्र्रभाव ग्रहण किए हुए है। जिसके कारण इस अंचल विषेष की भाषा न तो षुद्ध बंुदेली ही है और न ही शुद्ध ब्रजी तथा राजस्थानी। ब्रज क्षेत्र के संपर्क में ज्यादा होने के कारण हम यहॉं की भाषा बुंदेली मिश्रित ब्रजी भी कह सकते हैं। इस भाषा के रूप की झलक मुरैना के लोक देवियों सम्बन्धी पर्व, उनके अनुष्ठानों और मान्यताओं में स्पष्ट दिखाई देती है। मुरैना जिले में कई प्रमुख लोक देवियॉं हैं-माता बहरारे वाली, माता निरारे वाली माता बसैया, सेढ़ वाली,  जलालगढ़ वाली माता, जवाहरगढ़वाली माता,  डंगैयावाली, लोक देवी सांझी आदि। इनमें से कुछ देवियों का संक्षिप्त परिचय हम यहॉं प्रस्तुत कर रहे हैं-
1-माता बहरारे वाली:-
इन पौरत्स्य चिंतन में आदि शक्ति की आराधना का विधान है, और प्रत्येक देवी की कोई न कोई लोक मान्यताएॅं और दन्तकथाएॅं प्रचलित होती हैं। महाभारत काल से जुड़ी हुई कुछ ऐसी ही कहानी है बहरारे वाली माता की। भारत में यूॅं तो माता के कई प्राचीन मंदिर हैं लेकिन पहाड़गढ़ के जंगलों में मॉं बहरारे वाली माता विराजमान है। नवरात्र के दिनों में मॉं बहरारे की मूर्ति रोज बड़ा रूप धारण करती है और नवमी के दिन मॉं की मूर्ति गर्भ गुभा से बाहर आ जाती है। बहरारे वाली माता के मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहॉं पांडवों ने अज्ञातवाष के दौरान अपनी कुलदेवी की पूजा की थी और इस पूजा के दौरान कुलदेवी एक विशाल शिला में समा गई थीं। उस शिला को कई बार स्थानीय लोगों ने मूर्ति रूप देने का प्रयास किया लेकिन सभी कोशिशे बेकार साबित हुईं बताया जाता है कि यहॉं माता को पांडव लाये थे और माता की प्रतिष्ठा कराई थी। उस वक्त यहॉं बहुत घना जंगल था और दूर-दरे तक कोई भी नहीं रहता था। उसके बाद संवत 1152 में बिहारी ने बहरारा बसाया था। तदुपरांत संवत 1621 में खांडेराव भगत ने बहरारा माता के मंदिर का निर्माण कराया था। तब से लेकर आज तक मंदिर परिसर को श्रद्धालुओं के सहयोग से विकसित किया गया और हर नवरात्रि पर मेला और भक्तों का तांता लगा रहता है।
बताया जाता है कि पांडवों की पूजा के बाद प्रसन्न हुई कुलदेवी ने अर्जुन से यथेच्छ वर मॉंगा। कुलदेवी ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन, मैं तुम्हारी भक्ति और पूजा से खुश हॅूं। बताओ तुम्हें क्या वरदान चाहिए। तब अर्जुन ने कहा हे मॉं, मुझे आपसे वरदान में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, न ही मैंने आपकी पूजा किसी वरदान के लिए की है। मेरी तो बस ये इच्छा है कि समय और नीति के अनुसार हम पांॅच भाइयों को 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास का समय व्यतीत करना है, इसलिए मैं चाहता हॅॅं कि आप प्रसन्नता पूर्वक मेरे साथ चलें। तब कुलदेवी ने कहा कि हे अर्जुन मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत खुश हूॅं।.....तुम मेरे कृपापत्र बन गए हो, मैं चाहते हुए भी तुम्हें मना नहीं कर सकती, अर्जुन मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हॅूं पर मेरी एक शर्त है कि तुम आगे चलोगे और मैं पीछे। जहॉं भी तुमने मुझे पीछे मुड़कर देखा मैं वहीं पर स्थाई रूप से विराजित हो जाऊॅंगी। अर्जुन ने अपनी कुल देवी की बात मान ली और वह आगे-आगे चल दिया। काफी समय चलने के बाद जब अर्जुन जंगलों के रास्ते से गुजरते हुए विराट नगरी पहुॅंचे तो उन्हें लगा कि देख लॅूं कि कुल देवी कहीं पीछे तो नहीं रह गई। तभी अर्जुन ने पीछे मुड़कर देख लिया।। अर्जुन के पीछे मुड़ते ही हस्तिनापुर से पीछे-पीछे चल रही कुलदेवी एक शिला में प्रवेश कर गई। तब अर्जुन को कुलदेवी को दिया हुआ वचन याद आया। अर्जुन ने बार-बार कुलदेवी से विनती की लेकिन कुलदेवी ने कहा, अर्जुन अब मैं यही पर इस शिला के रूप में ही रहॅूंगी। तब से आज तक पांडवों की कुल देवी आज भी शिला के रूप में ही पूजी जाती है।
 
                                   माता बहरारे वाली, पहाड़गढ़ 
माता के चरणों में है कभी न सूखने वाला जलकुंड-मुरैना से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी एवं कैलारस से लगभग 20 किलोमीटर दूरी पर माता बहरारे का मंदिर स्थित है। यहॉं प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालू माता के दर्षन करने आते हैं। बहरारे वाली माता मंदिर से लोगों की अटूट श्रद्धा और आस्था जुड़ी हुई है मंदिर में माता के चरणों में जल कुंड है। इसका जल कभी भी नहीं सूखता है। इस जल को ग्रहण करने वालों की मनोकामना पूर्ण होती है और सारे रोग दोष क्लेश नष्ट हो जाते हैं। इसे जनकल्याण की देवी कहा जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि इसके जल सेवन से चेचक जैसा असाध्य रोग भी ठीक हो जाता है। 

2-माता निरारे वाली:-
मुरैना जिले की जौरा तहसील की लोक देवी अंतर्गत आने वाली निरारे वाली माता के बारे में भी कई लोक मान्यताएॅं प्रचलित हैं। सर्वप्रचलित मान्यता के अनुसार इसे नेत्र की देवी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसके दर्शन मात्र से असाध्य से असाध्य नेत्र रोग ठीक हो जाता है। निरार माता पर प्रतिवर्ष वैषाख माह की चतुर्थी से मेला भी शुरू होता है। जिसका आयोजन नवमी तक किया जाता है। माता के दर्शन के लिए प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुॅंचते हैं। यह जौरा से लगभग 20 किलोमीटर की दूर जंगलों में निरार माता विराजमान है।
 
                            माता निरारे वाली, जौंरा


अ. तेंदूफल का स्वाद चखते हैं लोग-
तेंदूफल का स्वाद आमतौर पर लोग नहीं चख पाते हैं। सिर्फ निरार माता का मेला ही ऐसा स्थान है जहॉं लोग इस फल का स्वाद चख पाते हैं। जंगली इलाकों में पैदा होने वाली यह गहरे पीले रंग का फल आकार व स्वाद में चीकू की तरह होता है और बाजार में उपलब्ध नहीं होता, लेकिन निरार मेले में आसपास के ग्रामीण जंगलों से इन्हें लाकर यहॉं बेचते हैं।
ब. मंदिर परिसर में नृत्य कर मॉं की कृपा का पात्र बनते हैं श्रद्धालु-
निरार माता के दरबार में ज्यादातर श्रद्धालु नृत्य करते हैं चाहे कुछ देर के लिए ही करें। ऐसा मानना है कि मैया के दरबार में नृत्य करने से मॉं की कृपा बरसती है। इसलिए महिलाएॅं तो अधिकांश नृत्य करती हैं। नगाड़े व ढोल वाले मैया के दरबार में मेले के समय उपस्थित रहते हैं। ढोल-नगाड़े वालों को नृत्य करने वाली महिला के परिवारजन न्यौछावर करते हैं।

स. नेजा चढ़ाने और कनकदंडवत देने की प्रथा-
निरार माता के दरबार में लोगों की मुराद पूरी होने पर नेजा चढ़ाए जाते जाते हैं और कनकदंडवत देकर मैया आषीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
3-माता बसैया:-
माता बसैया मन्दिर मुरैना जिले का प्राचीन ऐतिहासिक व लोक प्रसिद्ध मंदिर है। प्रतिवर्ष 15 से 16 लाख श्रद्धालु यहॉं आते हैं। यहॉं प्रसिद्ध दक्षिण काली के एवं मॉं चामुण्डा के अद्भुत विग्रह हैं। लोगों में इसके प्रति भक्तिभाव व श्रद्धा के साथ काम्य सिद्धि भी काफी है।
 

4-सेढ़ वाली माता:-
यह सम्पूर्ण मुरैना जिले और विशेष तौर पर सबलगढ़ अंचल में पूजी जाने वाली लोक देवी है। सबलगढ़ अंचल में नव विवाहित बहू को सबसे पहले सेढ़ वाली माता के ही दर्षन कराए जाते हैं, नवदुर्गा महोत्सव के दौरान महिलाओं द्वारा नौं दिल जल चढ़ाने का विधान है।
5-सॉंझी:-
   पौरस्त्य संस्कृति अर्वाचीन और विविध आयामी है, और इन आयामों मेें से एक आयाम है, पौरस्त्य संस्कृति के पर्व। इन पर्वों में कुछ लोक बाल पर्व भी आते हैं, जैसे-सॉंझी, टेसू और झॉझी। यह पर्व आंचलिकता, परम्परा, मनोरंजन, ऐतिहासिकता, लोक चित्र शैली और आध्यात्मिकता की दृष्टि से तो अति महत्त्वपूर्ण हैं ही, साथ ही ये पर्व भारतीय लोक-पर्वों के एक अंग के रूप में स्थापित हैं, जिनसे तत्कालीन समाज और संस्कृति के साथ-साथ पुरावृत्तीयता और पुरातनता की झॉंकी हमारे सम्मुख प्रस्तुत होती है।  भारत का केन्द्र बिन्दु मध्यप्रदेश पौरस्त्य संस्कृति के विविध फलकों को अपने में सजाए हुए है, जिनमें से एक फलक लोक बाल पर्व रूप भी हैं। इन पर्वों में मुरैना की सॉंझी एक प्रमुख लोक बाल पर्व है। सॉंझी बालिकाओं की प्रतीकात्मक लोक देवी है।
               
     बलिकाओं द्वारा मनाये जाने वाले इस पर्व (सॉंझी) का नामकरण सायंकालीन बेला में मनाये जाने के कारण ‘सॉंझी‘ (मालवा मेें संजा) हुआ।
     मुरैना अंचल में बालिकाएॅं दीवार पर गोबर से सॉंझी का चित्रांकन करती हैं। प्रचलित पारम्परिक मान्यताओं के अनुसार सॉंझी लोक देवी आदिशक्ति पार्वती का ही एक प्रतीक रूप है। सॉंझी के पूजन में मुख्यतः कन्याएॅं सुन्दर वर, चिर सौभाग्य, सुखी दाम्पत्य जीवन के अलावा पारिवारिक सदस्यों की सुख-शांति की कामना भी करती हैं।
     मुरैना में सॉंझी के निर्माण और इस पर्व को मनाने की प्रक्रिया श्राद्धारम्भ के प्रारंभ दिवस भाद्रपक्ष शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होती है। जिसका प्रतिदिन नवीन रूप में चित्रांकन किया जाता है। यह पर्व पंद्रह दिन तक सतत् रूप से मनाया जाता है। जिसमें विविध लोकगीतों के माध्यम से सॉंझी की आरती, बधाई, प्रशसा आदि बालिकाओं द्वारा की जाती है, जिसमें मनोकामना की भावना भी निहित रहती है।
     मुरैना के लोकबाल पर्व सॉंझी के प्रथम दिन ‘पंचगुटा‘ का चित्र बनाया जाता है। यह ‘पंचगुटा‘ एक ऑंचलिक खेल चौपड़ का प्रतीक है, लेकिन फिर भी ‘पंचगुटा‘ को खेलने का तरीका चौपड़ से कुछ भिन्न होता है। इस खेल में लड़कियॉं पत्थर के पॉंच गुट्टे बनाकर उनसे खेलती हैं।
     संजा पर्व के प्रथम दिन ‘पंचगुटा‘ को गोबर से निर्मित कर उसे विविध फूल पत्तियों से सजाया जाता है, तत्पश्चात एक थाली में कुमकुम, चावल, दीपक आदि रखकर सॉंझी के इस प्रथम रूप की आरती उतारी जाती है, और भोग लगाया जाता है-
                तुम करौ चंदा लल की बैन, संजाबाई की आरती करौ।
                प्यारे का फल होय, भईया फल होय, भतीजो फल होय।
                मेरी माई संजा की आरती करौ।।
आरती और भोग का क्रम प्रतिदिन चलता रहता है, इसके अतिरिक्त कुछ अन्य गीत भी प्रतिदिन इस अवसर पर गाये जात हैं-
1- छोटी सी गाड़ी लुड़कत जाय, बामे सॉंझी बाई बैठी जाय।
   चूड़ला खनकाती जाय, घाघरो घुमकाती जाय।
   छोटी सी गाड़ी लुड़कत जाय, लुड़कत जाय।।
2- हमारी सॉझी रानी,
   कुम्हार की मौड़ी कानी
   भल्ला बेटा पानी।।
3- हमाई सॉंझी लडुआ खाय, पेड़ा खाय।
   औरन की सॉंझी रोटी खाय, साग खाय।।
   हमाई सॉंझी कचौड़ी खाय, समौसा खाय।
  औरन की सॉंझी भूखी मरे, प्यासी मरे।।
4- हल्दी गांठ गठीली, भैया बैठके गइयो।
   ऊपर मोर नचईयो, नीचे घॅुंघरू बजइयो।।
    मुरैना में संजा पर्व के दूसरे दिन चौक बनाया जाता है, जो कि भारतीय लोक संस्कृति में किसी मेहमान और त्यौहार के आगमन का प्रतीक तो है ही साथ ही मंगल का प्रतीक भी है। यह संजा पर्व के आरम्भ का प्रतीक भी है। संजा पर्व के तीसरे दिन ‘गणेश‘ जी का चित्र गोबर के माध्यम से निर्मित किया जाता है। ‘गणेश‘ किसी भी मंगल कार्य के आरम्भ का प्रतीक होने के साथ-साथ, एकाग्रता और धैर्य का प्रतीक हैं। चौथे दिन गमले में लगा तुलसी का पौधा बनाया जाता है, जो कि हमारी भारतीय संस्कृति में पूज्य माना जाता है, साथ ही वह देवी-देवताओं और पितृ-गणों का निवास स्थान माना जाता है। पॉंचवे दिन सॉंतिया बनाया जाता है जो सुख-समृद्धि और किसी शुभ कार्य में होने वाले विघ्न बाधा को दूर करने, अमंगल का नाश करने और मंगल का विधान करने का प्रतीक है। छटवें दिन चॉंद तारे और सूरज का रूप बनाया जाता है। सूरज जहॉं ऊष्मा और प्रकाश का प्रतीक है, वहीं चॉंद तारे शीतलता का प्रतीक हैं ।    सातवें दिन मोर निर्मित किया जाता है, जो हमारा राष्ट्रीय पक्षी है। आठवें दिन हाथी बनाया जाता है, जोकि धीर और गम्भीरता का प्रतीक है। नौवे दिन चक्र बनाया जाता है, जो कि श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र के साथ-साथ सुरक्षा की भी प्रतीक है। दशवें दिन बीजना का निर्माण किया जाता है, जो कि मुरैना जिले की लोक परम्परा (जिसमें शादी के अवसर पर बीजने से भोजन के लिए बैठे मेहमानों की हवा बतौर मेहमाननवाजी घर की महिलाओं द्वारा की जाती है) का प्रतीक तो है ही, साथ ही महिलाओं द्वारा इसे शुभ भी माना जाता है। ग्यारहवें दिन मेहतर-मेहतरानी (सफाई कर्मी) का चित्र बनाया जाता है, जोकि साफ और स्वच्छता का प्रतीक है। बारहवें दिन ऊॅं का चित्र बनाया जाता है जो कि एकाग्रता और शांति का प्रतीक होने के साथ-साथ ब्रह्म-प्राप्ति का सूत्र भी है। तेरहवें दिन कमल बनाया जाता है जो कि मॉं सरस्वती का आसन होने के साथ-साथ हमारा राष्ट्रीय पुष्प भी है। चौदहवें दिन मूड़फोड़ा का चित्र बनाया जाता है, जिसे सॉंझी का भाई माना जाता है, और वह उसे लिवाने के लिए आता है, लेकिन वह सॉंझी के लिए उपहार स्वरूप कुछ नहीं लाता, तब बालिकाएॅं यह गीत गाती हैं-
ऐरे मूड़फोरा हमाई सॉंझी का बिन्दा कौं नई लाओ।
अबकी तो भूलो बहना, परकी लियांगो।
अबकी परकी तू करै, बिन्दा कबहॅूं न लावे।
ऐरे मूड़फोरा हमाई सॉंझी को झुमका कौं नई लाओ।
अबकी तो भूलो बहना, परकी लियांगो।।
इस तरह बालिकाएॅं गीत के माध्यम से मूड़फोरा से परस्पर संवाद करती हैं, और प्रष्न पूछती हैं।
     मुरैना जिले में सॉंझी पर्व के पंद्रहवें और आखिरी दिन किला कोट बनाया जाता है, जिसमें  सॉंझी का रूप प्रस्तुत किया जाता है, और उन सम्पूर्ण चित्रों को भी उस किलाकोट मंे पुनः एक साथ चित्रित किया जाता है, जो पूर्व में चौदह दिन तक बनाए जाते हैं । इस अवसर पर यानि कि सॉंझी के आखिरी दिन कुछ विशेष भोजन इत्यादि का आयोजन किया जाता है, तथा उस सॉंझी के एकत्रित गोबर इत्यादि सामग्री को जल में विसर्जित कर दिया जाता है, और इस तरह इस लोक बाल पर्व का समापन हो जाता है।
   मुरैना जिले में और भी कई लोक देवियॉं और उनकी मान्यताएॅं तथा कथाएॅं, जिनकी पड़ताल ग्रामीण अंचलों में जाकर की जाए तो कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर लोक देवियों से सम्बन्धित हो सकते हैं। मुरैना जिले की सहरिया जनजातियों की लोक देवियों सम्बन्धी मान्यताओं खोजने की असीम सम्भावनाएॅं भी यहॉं विद्यमान हैं। मुरैना जिले की अम्बाह, पोरसा, दिमनी तहसीलों में भी कई लोक देवियॉं और उनकी मान्यताएॅं हैं, जिनकी सम्पूर्ण जानकारी यहॉं दे पाना संभव नहीं है, फिर भी अगर यह परियोजना स्वीकृत होती है, तो मेरे द्वारा किया गया कार्य आपकी वृहद परियोजना के लिए अति महत्त्वपूर्ण साबित होगा।
 अंततः कहा जा सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की परंपरा से प्राप्त वहॉं के मानव-समूह की निरंतर उन्नत मानसिक अवस्था, उत्कृष्ट वैचारिक प्रक्रिया, व्यावहारिक षिष्टता, आचारगत पवित्रता, सौन्दर्याभिरुचि आदि की परिष्कृत, कलात्मक और सामूहिक अभिव्यक्ति ही वहॉं की लोक संस्कृति है। मानव समूह की भाषा-बोली, धर्म दर्षन, साहित्य शिल्प, कला, सामाजिक परंपराओं एवं मूल्यों, जातीय आदर्शो, संस्कारों, अनुष्ठानों और लोक विश्वासो आदि के रूप में उसकी लोक संस्कृति के विविध आयाम दृष्टिगत होते हैं। मध्यप्रदेश की संस्कृति विशाल भारतीय संस्कृति का ही एक लघु संस्करण है। 
मुरैना जिले की लोक देवियॉं, उनकी विविधता, प्रचलित लोक मान्यता, अनुष्ठान, विधान, और विशिष्ट मूर्तिशिल्प के कारण अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। इन देवियों के स्थानों पर मनाए जाने वाले पर्वों में धार्मिक सौहार्द, संवादात्मकता, हास्य-व्यंग्यात्मकता तत्कालीन प्रचलित खेलकूद, लोक मान्यताएॅं, राष्ट्रीय बोध, लालित्य बोध, शांति, सुरक्षा, आदि का पुट होने के साथ ही इसमें आनुष्ठानिक बोध स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। लोक देवियों से मान्यताएॅं, रीति-रिवाज एवं सामाजिक मान्यताओं की स्थापना करते हैं। इनसे सम्बन्धित होने वाले आयोजनों से समाज में फैली विविध कुप्रथाओं को समाप्त कर परस्पर आत्मीयता, सहयोग, उत्तरदायित्व की भावना एवं जिज्ञासा वृत्ति आदि गुणों को विकसित किया जाता है। इनके दर्शन मात्र से मस्तिष्क की उर्वरता व तर्क शक्ति का विकास होता है 
   मुरैना जिले में आज से लगभग पन्द्रह से बीस वर्ष पूर्व इन देवियों का आध्यात्मिक स्वरूप और स्पष्ट तथा मान्यताएॅं अपने चरम पर थीं, परन्तु आज यह बिल्कुल समाप्ति की ओर है। इसका कारण बदलता हुआ परिवेष, नगरीकरण, आधुनिक और पाश्चात्य मानसिकता है। लेकिन फिर भी हम मुरैना जिले से सम्बन्धित लोक देवियों से सम्बन्धि सूत्रात्मक अभिज्ञानता को सहेजकर, सुरक्षित कर भारतीय संस्कृति के इन अंगों को क्रियात्मक रूप में नही ंतो, अभिलेखित रूप में तो जीवित रख सकते हैं।

चायनीज़ मार्केट से Exit की तैयारी और आर्थिक राष्ट्रवाद

वैश्विक महामारी के जिम्मेदार चीन का उद्देश्य अपने प्रतिद्वन्द्वी देशों की अर्थव्यवस्था को चौपट कर उनके आर्थिक ढाँचे को अपने नियंत्रण में करना था, लेकिन समय रहते उसके नापाक इरादों का पटाक्षेप हो गया और सम्पूर्ण विश्व जल्द ही सचेत हो गया, विशेष तौर वे देश जो चीन से प्रत्यक्ष व्यापारिक स्तर पर जुडे़ हैं|  चीन को लेकर भविष्यगत भारतीय नीति के साथ-साथ सम्पूर्ण वैश्विक योजनाओं और नीतियों पर मंथन करने का यह महत्वपूर्ण समय है| अब यह माना जा रहा है कि इस संकटकाल में एक महत्वपूर्ण विचारधारा भारत में उत्पन्न चुकी है, वह है आर्थिक राष्ट्रवाद् | भारतीय मनस्तत्व में इस बात की गहरी पैठ हो जानी चाहिए कि हमें भी उन सभी संसाधनों का परित्याग करना ही होगा जो सीधे रूप में चीनी हिस्सेदारी से जुडे़ हों| आज भारत में कई साफ्टवेयर कम्पनियाँ एवं अन्य एजेंसियाँ ऐसी हैं जो भारत में चीन की हिस्सेदारी बढा़कर भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकती हैं| अगर हमें इस स्थिति से बचना तो हमें इन पर अपनी निर्भरता समाप्त करनी होगी इसका एक ही तरीका है और वह है आर्थिक राष्ट्रवाद| कुछ समय पूर्व ही पेटीएम पर चीनी कंपनी अलीबाबा का नियंत्रण और बढ़ गया| रिलायंस कैपिटल ने डिजिटल पेमेंट फर्म पेटीएम में अपनी एक फीसदी हिस्सेदारी बेच दी है. ... रिलायंस समूह की इस कंपनी ने पेटीएम में इस हिस्सेदारी के लिए 275 करोड़ रुपये का निवेश किया था. इस सौदे के बाद पेटीएम की आर्थिक हैसियत बढ़कर 4 अरब डॉलर से ज्यादा हो गई है.| चीन की स्मार्टफोन कंपनी जियोनी की  भारत में लगभग 650 करोड़ रुपये निवेश किया है. यह कंपनी देश के पांच शीर्ष स्मार्टफोन ब्रांड में शामिल होने का लक्ष्य लेकर चल रही है. इसके अलावा कूलपैड, ओप्पो, वीवो, लेनोवो, मीजो, वन प्लस, जोपो, जेड टी ई. mi. xiomi आदि कई मोबाईल कम्पनियाँ ऐसी हैं जो भारतीय मोबाईल व्यापार में अपना एकछत्र राज कायम कर चुकी हैं| यह कुछ छोटे से उदाहरण हैं | जमेटो भी इसी तरह का एक उदाहरण है, पर स्थिति इससे कई गुना बढ़कर है| भारत में खिलौना, क्रोकरी, इलेक्ट्रीकल, इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पर तो भारत की आधी से अधिक आबादी निर्भर है|  भारत में चिकित्सा के आयामों की चर्चा की जाये तो देखा जा सकता है कि जैनरिक दवाई मुख्य घटक है API एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (API) उसका ७०% तक आयात हमें चीन से करना पड़ता है, अब तो हमारी स्थिति खतरे के लाल निशान से ऊपर है, अगर हमें चीन की चाल से बचना है और भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ करना है तो हमें चीनी सामान के साथ-साथ  हर क्षेत्र की चीनी भागीदारी वाली कम्पनियों से दूरी ही नहीं बनानी होगी अपितु उन्हें पूर्णतः त्यागना होगा, उनका बहिष्कार कर भारत में निर्मित ब्रांड के उपयोग का संकल्प लेना होगा, लेकिन इसके लिए सबसे पहले भारतीयों की  क्रय क्षमता में बड़ोत्तरी की भी ज़रूरी है क्यूँकि अभी भी आप और हमारे जैसे मध्यम वर्गीय परिवार भी इतने समर्थ नहीं है जो चीनी वस्तुओं के परित्याग पूरी तरह कर सकें तो फिर निचले तबके की बात ही क्या करना। और यही दो वर्ग भारत की सबसे बड़ी जनसंख्या है और चीनी वस्तुओं के सबसे बड़ा बाज़ार भी| इसके साथ-साथ, उदारीकरण,  निजीकरण, भूमण्डलीकरण (एल, पी, जी,) और एफ डी आई की अंतर्राष्ट्रीय बाध्यता के चलते अभी तक हम विदेशी बाजार को रोकने में नाकामयाब रहे, पर इसका मतलब यह नहीं कि वैश्वीकरण से कोई लाभ नहीं हुआ, पर चीन इस बाध्यता का अब दुरुपयोग कर रहा है, इसीलिए सरकारी स्तर  पर इसे एफ. डी. आई. पर कमान कसने हेतु भारत सरकार प्रणबद्ध है, नये नियम के तहत अब विदेशी कम्पनियों को भारत में सीधे व्यापार करना आसान नहीं होगा, इसके लिये सरकार की अनुमति की भी आवश्यकता पडे़गी| सरकार के इस कदम से ड्रेगन भी बुरी तरह बौखलाया हुआ है, इसके साथ-साथ आर्मी सेक्टर की केंटीन में अब भारतीय सामग्री का ही विक्रय होगा, इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 50 लाख लोग जुड़े हैं, यह सरकार का दूसरा सराहनीय प्रयास है, इसी प्रकार कई अन्य बड़े कदम भी सरकार उठाने की तैयारी में है, जिसके सकारात्मक परिणाम हमें भविष्य में देखने को मिलेंगे| लेकिन  भारतीय जन-मानस को सरकार के साथ आगे आना होगा उसके साथ कदम से कदम मिलाकर खडा़ होना होगा| भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट होने से बचाने और चीन जैसे दुश्मन के घटिया मंसूबों को पूरा न होने से बचने के लिये आर्थिक राष्ट्रवाद ही एक विकल्प है| स्वदेशी की ओर लौटना, और यह लौटना,  आपाधापी के शहर से अपने खूबसूरत गाँव की ओर लौटने जैसा ही है| आर्थिक राष्ट्रवाद राष्ट्र भक्ति का ही एक पहलू है, जिसको वगैर युद्ध के सिर्फ़ अपने चिंतन और संकल्प से किया जा सकता है, एवं सरकार साथ जनता-जनार्दन को भी आगे आकर भी विदेशी विशेष तौर पर चीन के उत्पादों का बहिष्कार करना पडे़गा और जब हम उनके उत्पादों का क्रय करेंगे ही नहीं तो उन कम्पनियों को हमारे देश से निश्चित ही पलायन करना पडे़गा,  लोकल के लिए वोकल होने से हम निश्चित ही आत्मनिर्भर बन पाएँगे, इस महामारी में जब बड़ी कम्पनियाँ हमारा साथ नहीं दे पायीं तब लोकल ने ही हमारा साथ दिया|
डाॅ भूपेन्द्र हरदेनिया
लेखक युवा चिंतक और शासकीय नेहरू डिग्री कालेज सबलगढ़ में व्याख्याता हैंं

मो-8516962323

आत्मचेतस् से सम्पृक्त लोकचेतनावादी कविता संग्रह (ऑंख ये धन्य है-नरेन्द्र मोदी, अनुवाद अंजना संधीर) -डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया (पुस्तक समीक्षा)

आत्मचेतस् से सम्पृक्त लोकचेतनावादी कविता संग्रह
(ऑंख ये धन्य है-नरेन्द्र मोदी, अनुवाद अंजना संधीर)
-डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया

आचार्य भरत का कथन है-
सा कविता सा बनिता यस्याः श्रवनेने स्पर्शनेन च।
कवि हृदयं पति हृदयं सरलं-तरलं सत्वरं भवति।।
अर्थात् एक सुन्दर और श्रेष्ठ कविता वही है जो अपने श्रोता, पाठक, सहृदय का उसी प्रकार साधारणीकरण कर दे जिस प्रकार एक सुन्दर स्त्री अपने पति के हृदय को आल्हादित कर उसका सरलीकरण कर देती है, उसे आनंन्दित कर देती है।। ऐसी आनंद की अनुभूति प्रदान करने वाला गुजराती से हिन्दी में अनूदित एक काव्य संग्रह ‘ऑंख ये धन्य है‘ अभी हाल में चर्चा में आया, जिसके रचनाकार हैं हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी। मूल रूप से इस संग्रह की निर्मिती गुजराती में हुई है, लेकिन उसे हिन्दी पाठकों तक पहॅुंचाने का महनीय कार्य डॉ0 अंजना संधीर ने किया है। उनका यह प्रयास इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्यों कि एक श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ को एक श्रेष्ठ कवि के रूप में लोगांे तक पहॅंुचाने कार्य इसी काव्य संग्रह से अवश्यम्भावी रूप से किया जा सकेगा। कवि नरेन्द्र ने अपने वैयक्तिक एवं निर्वैयक्तिक जीवन काल में जो भोगा, जिन हकीकतों से उनका आत्मसाक्षात्कार हुआ, उसे उन्होंने अपने सिसृक्षण के दौरान जस का तस बयॉं करने के साथ ही अपने व्यक्तित्व की झॉंकी सहज पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दी है। उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज को, अपने गहन अनुभव को बगैर किसी आवरण के, प्राकृतिक तौर पर ही अभिव्यक्त किया है। ‘‘शृंगारित शब्द नहीं मेरे/नाभि से प्रकटी वाणी हॅूं।/करता हॅूं इस धरती से प्रीत/खामोशी का आनंद लेते हुए/गाता हॅूं गीत।‘‘ मोदी की प्रत्येक कविता जल में बुलबुल के माफिक पाठक के समक्ष प्रस्तुत होती है, और हर कविता एक नये बुलबुले मंे प्रदर्शित बिम्ब की तरह एक नया अनुभव, एक नयी बात सहृदय को दे जाती है। 
  कवि नरेन्द्र मोदी का यह कविता संग्रह ‘ऑंख ये धन्य है‘ उनके लंबे अनुभव और चिंतन से उपजी कविताओं का संकलन है। यहॉं चिंतन की ठोस जमीन तो है लेकिन वह विषय में इतना घुल-मिल गई है कि अंत में यहॉं एक मजबूत कविता की शक्ल ही हमारे सामने आती है। नरेन्द्र ने अपनी कविताओं में निरंतर एक नई व्यक्तिगत सजगता के कारण अपनी वैयक्तिक अनुभूतियों को निर्वैयक्तिक कर विभिन्न संदर्भों को पाठकों के समक्ष उठाया हैं। ‘‘सोलह बरस की रूपवती कन्या जैसी नदी/आज क्रोधित हो बाघिन हो गई है/वर्षा के कारण वो बेहद उच्छृंखल हो गई है/उसे किसी की लाज, शर्म नहीं है/अपना संयम गॅंवा/पागल स्त्री की तरह........................विनाश करती प्रकृति/हमें अपना विकृत परिचय देती है/हॉं, जल के जानलेवा जुनॅूंन का।‘‘ वही समाज, वही परिवेश, वही समस्याएॅं, वही विषय लेकिन एक नये रूप में अलग-अलग किस्म की कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत करना नरेन्द्र की मौलिक काव्य प्रतिभा की विशेषता है, जो इस काव्य संग्रह में स्पष्ट होती है।
ठेठ गॉंव से लेकर अपार्टमेंट और शहरी परिवेश की चमक-दमक तथा देश का यथार्थ तक उनकी निगाहों में, इसीलिए कवि मन को सुकून नहीं पाता, कवि नरेन्द्र के इस लंबे अंतराल का यह अनुभव को अपनी कविताओं संजोया है-मन में मेरे जंगल लगे हैं/अंग-अंग में आग/जंगल में मैं ढॅंूढ़ता हॅूं/हरा-भरा वह बाग।/सुखी देखे, दुःखी देखे/देखे रोगी भोगी/माया जिसने छोड़ी/उसी काया निरोगी।/झन-झन, झन-झन तार-तार पर/बजता बिना छिड़ा सा राग/मन अपने को समझाता हॅूं/जाग अभी तो जाग। नरेन्द्र की कविताओं में एक विशेष दर्शन पक्ष उभर कर हमारे सामने आता है। वह जानते हैं कि जीव जगत सब एक छलावा मात्र है, इस संसार में व्यक्ति सर्वत्र सुख की अनुभूति कर सकता है, जो माया के वसीभूत नहीं है, अन्यथा दुःख ही दुःख है, अतः रचनाकार पाठक को चेताता है कि अब तो जाग जाओ।
नरेन्द्र मोदी के इस संग्रह में चिंतन बहुत गहरे में धॅंसकर आया है। यह समाज और समय क्यों कठिनतम होता जा रहा है, वे इसे भली-भॉंति जानते हैं और उसे इशारों में कहना भी चाहते हैं। ‘‘ धरा/की पुकार है/गगन की पुकार है/पथ भूले हुए पंथ हैं और पार्थ को ललकार है/सम्प्रदायों में बॅंटता मानव/मानव से बनता है दानव/हुंकार, हो-हल्ले से/हुए हैं बहुत से हंगामे यहॉं/अभिमान की खड़ी दीवारें हैं यहॉं/और सपनों का संहार है/ललकार है, पुकार है।/समानता की बातें, बातें ही रहीं/और एकता ही पिसती गई/संविधान के बंद दरवाजे और ईर्ष्या-द्वेष की खाई रह गई/ऑंसू चारों ओर हैं/और सब जगह अंधकार है। अपने देश, अपने संविधान, अपनी संस्कृति, मानवीय पतन की बेइंतहा चिंता ही नरेन्द्र मोदी को हमारे समय का एक जरूरी कवि बनाती है, और उनकी कविता को एक महत्त्वपूर्ण कविता। 
आम जीवन की बेबाकी से जिक्र करना और उनकी विसंगतियों की सारी परतें खोल देना यह विवेक और चिंता की ऊॅंचाइयों का परिणाम होता है। आज जो साहित्य रचा जा रहा है, वह लेखन की कई शर्तों को अपने साथ लेकर चल रहा है। एक तरफ जिन्दगी की जहॉं गुनगनाहट है, वहीं दूसरी तरफ जवानी को बुढ़ापे में तब्दील होने की जिद्द भी है, इन्हीं सब शर्तों के अनेक रंगों को अपने इस कविता संग्रह में पिरोने का साहस श्री नरेन्द्र मोदी ने किया है। ‘‘कोई पंथ नहीं, ना ही सम्प्रदाय/मानव तो बस है मानव,/उजाले में क्या फर्क पड़ता है, दीपक हो या लालटेन।‘‘
उनका यह संग्रह वीरान जिंदगी के कब्रिस्तानों पर एक ओर जहां जीवन और मुहब्बत के गीत लिखता है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान जीवन की विसंगतियों से लड़ने की ताकत भी देती है। संग्रह की कविताओं के रंग इन्द्रधनुषी हैं, लेकिन सारी कविताओं का मूल स्वर जीवन और जीवन तथा जगत का यथार्थ है। इससे प्रतीत होता है कि कवि ने अपनी कविताओं में जिया ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है। इन दोनों क्रियाओं ‘जीना और भोगना‘, ऐसी काई में पगडंडी है, जिस पर फिसलने का डर हमेशा बना रहता है। मोदी जी ने स्वयं को फिसलने नहीं दिया है, जो भी लिखा है मजबूती के साथ और साफ-साफ लिखा है-‘‘भाग्य को कौन पूछता है यहॉं?/मैं तो चुनौती स्वीकारने वाला मानव हॅूं।/मैं तेज उधार नहीं लॅूंगा/ मैं तो खुद ही जलता हुआ लालटेन हॅूं।/मैं किसी का मोहताज नहीं/मुझे मेरा उजाला पर्याप्त है। अंधेरे की लहरों को काटे/कमल के तेज-सा स्फूर्तिवान है।‘‘ सच में उत्साह आदमी को किरदार की आईनासाजी का हुनर सिखाता है। यह हुनर मोदी जी के लेखन का आत्मबल है। संग्रह की कविताओं के पाठ के बाद यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 
यह तो माना ही जा सकता है कि मोदी जी की कविता दुनिया की आमजीवन शैली के आसपास घूमती है, लेकिन यह पूरे तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि मोदी जीवन की दुनिया के बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। इस संग्रह के अवलोकन के बाद स्पष्ट होता है कि इनका लेखकीय केनवास काफी बड़ा है, जीवन हरेक आहट नए-नए दृश्य तलाश करती है, जिसमें भोर की पहली किरण के साथ हसीन उजालों की सुगबुगाहट मिलती है। विरह और वियोग का एक छटपटाता हुआ पन्ना भी खुलता है और उस पन्ने पर बडत्रे ही सलीके से मोहब्बत का नाम लिखा जाता है। कुल मिलाकर भावस्थितियों की विविधता मोदी जी की कविताओं विपुल मात्रा में देखने को मिलती हैं कहीं बेबसी है तो कहीं कर्मोत्साह है। कहीं दैन्य है तो कहीं आक्रोश है। कहीं चीख है तो कहीं मूक संगीत है। कुल मिलाकर कवि की हृदय-तन्त्री से निकले हुए हर भाव का समायोजन संग्रह की कविताओं में बड़ी कुशलता और सटीकता से हुआ है। ‘‘अॅंधेरे के कागज पर/मैं एक सरोवर रेखांकित करता हूॅं/सरोवर पर झुकती है एक डाली/भॅंवरों की गुंजन लेकर/गहरे अंधकार को हल्का करने/मैं बनाता हॅूं एक चन्द्रमा/देता हॅंू, उसको नीला, आसमानी रंग/सरोवर के शांत जल जैसा/अचानक..........बैसाख की दुपहरी सूरज/कागज़ को जलाकर राख कर देता है/और मेरे हाथ में/कॉंप जाता है ब्रश-/मेंढ़क की चित्कार/मौसम के सपने/सपनों का मौसम/सभी कुछ भाप हो जाना।‘‘
प्रायः समझा जाता है कि कवि कल्पनाशील होता है और भविष्य के सुनहरे आदर्शवादी ताने-बाने बुनने में उसकी अधिक दिलचस्पी रहती है। ऐसा मोदी जी की कविताओं के परिप्रेक्ष्य में भी आंशिक सत्य हो सकता है लेकिन विशेष तौर पर मोदी जी की कविताएंॅ ठोस यथार्थ और भोगे हुए कड़वे सत्य को भावाकुलता के साथ उद्घाटित करने वाली जीवंत शब्द रचनाएॅं हैं,‘‘कारगिल/पहले भी गया था,/टाइगर हिल/पहले भी देखी थी/तब/राजाधिराज के श्वेत मौन को/जी भर कर देखा था/आज/हर चोटी/गर्जती थी/बोम्ब, बंदूह की गॅूंज से/बर्फ की शिलाओं पर धधकते अंगारों जैसे/सेना के जवानों को देखा/यहॉं/हर जवान/किसान था/जो अपने आज को बीज रहा था/अपने खून से सींच रहा था/ताकि हमारा कल/मुरझा न जाए/हर जवान की ऑंख में/उमड़ते सौ करोड़ सपने देखे/अपनी ऑंख की पलक से/मौत को जकड़ने वाले/वीर देखे/और यमराज को,/इन वीरों के चरण चूमते हुए देखा था।‘‘
मोदी जी के इस कविता संग्रह में विरोधाभाशी शैली का विशेष तौर पर इस्तेमाल किया गया है, आम कवियों की कविताओं की तरह मनोभावों को व्यंग्य के नुकीले बाणों, कैक्टस के नुकीले कांटों की तरह पाठक के हृदय को भेदने का कार्य मोदी की कविताओं ने नहीं किया है। उनकी कविताएॅं गुलाब के फूल के स्पर्श की तरह एक कोमल छुअन पाठक के हृदय को दे जाती है, वह सहृदय में उत्पन्न कर देती है, एक सिहरन, एक सबक, एक खुशबू वह भी स्मूथली। उनकी कविताओं में यह क्वालिटी खूब देखने को मिलती है कि वे पाठक को वगैर झिंझोडे़ ही बहुत कुछ कह जाती हैं, और उन्हें बहुत-कुछ सोचने पर भी मजबूर करती है- ‘‘स्वाभिमान-झूठ बोले, कौआ काटे/इसलिये हमें सत्य बोलना जरूरी है/सत्य ही तो हमारा स्वाभिमान है/मजबूरी नहीं/सत्य नहीं बोलें/तो कोयल की कुहूक को/मरी हुई मछली की तरह/कौआ चोंच,/मार-मार कर नष्ट कर देगा/अफवाहों पर आधारित समाचार/सुबह-सवेरे उगते हैं काले सूरज की तरह/सत्य से सत्याग्रह तक की/अपनी यात्रा में हमें मिलते हैं/बिना पैर चलते/प्रवासियों के पद्चिन्ह/केवल भीड़, टोलियॉं।‘‘
मोदी जी का यह अनूठा काव्य-संकलन ‘ऑंख ये धन्य है।‘ काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है। इसके लिए में मोदी जी को तो बधाई देना ही चाहॅंूगा, साथ ही में डॉ0 अंजना संधीर को भी उतना ही सधन्यवाद ज्ञापित करना चाहॅंूगा कि उन्होंने मोदी जी के इस कविता संग्रह को इतने सुन्दर और सहज ढंग से अनुवादित किया कि कही लगता ही नहीं कि इस पुस्तक को कोई अनुवाद हुआ होगा। स्त्रोत भाषा की किसी विधा को और विशेष तौर पर कविता को किसी लक्ष्य भाषा में स्थानांतरित करना और वह भी भाव बदलने न पाये वास्तव एक दुस्कर कार्य है, और दुस्कर कार्य को बड़े ही सहज रूप से करने का प्रयत्न अंजना संधीर ने किया, उनका यह कर्म भी सिसृक्षु की तरह ही एक तपश्चर्या है। वे वास्तव में बधाई की विशेष पात्र हैं। आशा करता हॅंू कि वे आगे भी इसी तरह के हिन्दीत्तर भाषी महत्त्वपूर्ण कविता संग्रहों और अन्य ग्रंथों को अनुवाद कर पाठकों के समझ ला सकेंगी और हिन्दी की समृद्धि कर सकेंगी। 
अंत में पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि ‘ऑंख ये धन्य है।‘ की कविताएॅं राष्ट्रीयता को पोषण प्रदान करने के साथ ही प्रगतिवादी विचारधारा का भी समाहार हैं। उनकी सम्पूर्ण कविताओं की विशेषताओं को चंद शब्दों में इस प्रकार बयॉं किया जा सकता है कि एक तरफ उनकी कविताओं में मीर के व्यंग्य पुट हैं तो दूसरी तरफ स्वामी रामतीर्थ का मस्तानापन, अल्हड़पन, भावुकता और भावावेश। इसके अलावा निराला की अभिव्यंजना शक्ति और लाक्षणिकता, पंत की दार्शनिकता और विचारशीलता, लोकमान्य तिलक के केसरी की सम्पादकीय जैसी निर्भीकता, विचार स्वतंत्रता और पैनापन इन सबका सम्मिलित प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इस संग्रह की कविताएॅं पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होंगी। संग्रह की तमाम कविताएॅं पठनीय और शिल्प के हिसाब से अत्यंत सटीक हैं, साथ ही कविताओं में छन्दात्मकता और मुक्त छंद दोनों को ही लावण्य देखते ही बनता है।
                       प्रस्तुतकर्ता
डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया