गुरुवार, 28 मई 2020

चायनीज़ मार्केट से Exit की तैयारी और आर्थिक राष्ट्रवाद

वैश्विक महामारी के जिम्मेदार चीन का उद्देश्य अपने प्रतिद्वन्द्वी देशों की अर्थव्यवस्था को चौपट कर उनके आर्थिक ढाँचे को अपने नियंत्रण में करना था, लेकिन समय रहते उसके नापाक इरादों का पटाक्षेप हो गया और सम्पूर्ण विश्व जल्द ही सचेत हो गया, विशेष तौर वे देश जो चीन से प्रत्यक्ष व्यापारिक स्तर पर जुडे़ हैं|  चीन को लेकर भविष्यगत भारतीय नीति के साथ-साथ सम्पूर्ण वैश्विक योजनाओं और नीतियों पर मंथन करने का यह महत्वपूर्ण समय है| अब यह माना जा रहा है कि इस संकटकाल में एक महत्वपूर्ण विचारधारा भारत में उत्पन्न चुकी है, वह है आर्थिक राष्ट्रवाद् | भारतीय मनस्तत्व में इस बात की गहरी पैठ हो जानी चाहिए कि हमें भी उन सभी संसाधनों का परित्याग करना ही होगा जो सीधे रूप में चीनी हिस्सेदारी से जुडे़ हों| आज भारत में कई साफ्टवेयर कम्पनियाँ एवं अन्य एजेंसियाँ ऐसी हैं जो भारत में चीन की हिस्सेदारी बढा़कर भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकती हैं| अगर हमें इस स्थिति से बचना तो हमें इन पर अपनी निर्भरता समाप्त करनी होगी इसका एक ही तरीका है और वह है आर्थिक राष्ट्रवाद| कुछ समय पूर्व ही पेटीएम पर चीनी कंपनी अलीबाबा का नियंत्रण और बढ़ गया| रिलायंस कैपिटल ने डिजिटल पेमेंट फर्म पेटीएम में अपनी एक फीसदी हिस्सेदारी बेच दी है. ... रिलायंस समूह की इस कंपनी ने पेटीएम में इस हिस्सेदारी के लिए 275 करोड़ रुपये का निवेश किया था. इस सौदे के बाद पेटीएम की आर्थिक हैसियत बढ़कर 4 अरब डॉलर से ज्यादा हो गई है.| चीन की स्मार्टफोन कंपनी जियोनी की  भारत में लगभग 650 करोड़ रुपये निवेश किया है. यह कंपनी देश के पांच शीर्ष स्मार्टफोन ब्रांड में शामिल होने का लक्ष्य लेकर चल रही है. इसके अलावा कूलपैड, ओप्पो, वीवो, लेनोवो, मीजो, वन प्लस, जोपो, जेड टी ई. mi. xiomi आदि कई मोबाईल कम्पनियाँ ऐसी हैं जो भारतीय मोबाईल व्यापार में अपना एकछत्र राज कायम कर चुकी हैं| यह कुछ छोटे से उदाहरण हैं | जमेटो भी इसी तरह का एक उदाहरण है, पर स्थिति इससे कई गुना बढ़कर है| भारत में खिलौना, क्रोकरी, इलेक्ट्रीकल, इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पर तो भारत की आधी से अधिक आबादी निर्भर है|  भारत में चिकित्सा के आयामों की चर्चा की जाये तो देखा जा सकता है कि जैनरिक दवाई मुख्य घटक है API एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (API) उसका ७०% तक आयात हमें चीन से करना पड़ता है, अब तो हमारी स्थिति खतरे के लाल निशान से ऊपर है, अगर हमें चीन की चाल से बचना है और भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ करना है तो हमें चीनी सामान के साथ-साथ  हर क्षेत्र की चीनी भागीदारी वाली कम्पनियों से दूरी ही नहीं बनानी होगी अपितु उन्हें पूर्णतः त्यागना होगा, उनका बहिष्कार कर भारत में निर्मित ब्रांड के उपयोग का संकल्प लेना होगा, लेकिन इसके लिए सबसे पहले भारतीयों की  क्रय क्षमता में बड़ोत्तरी की भी ज़रूरी है क्यूँकि अभी भी आप और हमारे जैसे मध्यम वर्गीय परिवार भी इतने समर्थ नहीं है जो चीनी वस्तुओं के परित्याग पूरी तरह कर सकें तो फिर निचले तबके की बात ही क्या करना। और यही दो वर्ग भारत की सबसे बड़ी जनसंख्या है और चीनी वस्तुओं के सबसे बड़ा बाज़ार भी| इसके साथ-साथ, उदारीकरण,  निजीकरण, भूमण्डलीकरण (एल, पी, जी,) और एफ डी आई की अंतर्राष्ट्रीय बाध्यता के चलते अभी तक हम विदेशी बाजार को रोकने में नाकामयाब रहे, पर इसका मतलब यह नहीं कि वैश्वीकरण से कोई लाभ नहीं हुआ, पर चीन इस बाध्यता का अब दुरुपयोग कर रहा है, इसीलिए सरकारी स्तर  पर इसे एफ. डी. आई. पर कमान कसने हेतु भारत सरकार प्रणबद्ध है, नये नियम के तहत अब विदेशी कम्पनियों को भारत में सीधे व्यापार करना आसान नहीं होगा, इसके लिये सरकार की अनुमति की भी आवश्यकता पडे़गी| सरकार के इस कदम से ड्रेगन भी बुरी तरह बौखलाया हुआ है, इसके साथ-साथ आर्मी सेक्टर की केंटीन में अब भारतीय सामग्री का ही विक्रय होगा, इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 50 लाख लोग जुड़े हैं, यह सरकार का दूसरा सराहनीय प्रयास है, इसी प्रकार कई अन्य बड़े कदम भी सरकार उठाने की तैयारी में है, जिसके सकारात्मक परिणाम हमें भविष्य में देखने को मिलेंगे| लेकिन  भारतीय जन-मानस को सरकार के साथ आगे आना होगा उसके साथ कदम से कदम मिलाकर खडा़ होना होगा| भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट होने से बचाने और चीन जैसे दुश्मन के घटिया मंसूबों को पूरा न होने से बचने के लिये आर्थिक राष्ट्रवाद ही एक विकल्प है| स्वदेशी की ओर लौटना, और यह लौटना,  आपाधापी के शहर से अपने खूबसूरत गाँव की ओर लौटने जैसा ही है| आर्थिक राष्ट्रवाद राष्ट्र भक्ति का ही एक पहलू है, जिसको वगैर युद्ध के सिर्फ़ अपने चिंतन और संकल्प से किया जा सकता है, एवं सरकार साथ जनता-जनार्दन को भी आगे आकर भी विदेशी विशेष तौर पर चीन के उत्पादों का बहिष्कार करना पडे़गा और जब हम उनके उत्पादों का क्रय करेंगे ही नहीं तो उन कम्पनियों को हमारे देश से निश्चित ही पलायन करना पडे़गा,  लोकल के लिए वोकल होने से हम निश्चित ही आत्मनिर्भर बन पाएँगे, इस महामारी में जब बड़ी कम्पनियाँ हमारा साथ नहीं दे पायीं तब लोकल ने ही हमारा साथ दिया|
डाॅ भूपेन्द्र हरदेनिया
लेखक युवा चिंतक और शासकीय नेहरू डिग्री कालेज सबलगढ़ में व्याख्याता हैंं

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आत्मचेतस् से सम्पृक्त लोकचेतनावादी कविता संग्रह (ऑंख ये धन्य है-नरेन्द्र मोदी, अनुवाद अंजना संधीर) -डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया (पुस्तक समीक्षा)

आत्मचेतस् से सम्पृक्त लोकचेतनावादी कविता संग्रह
(ऑंख ये धन्य है-नरेन्द्र मोदी, अनुवाद अंजना संधीर)
-डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया

आचार्य भरत का कथन है-
सा कविता सा बनिता यस्याः श्रवनेने स्पर्शनेन च।
कवि हृदयं पति हृदयं सरलं-तरलं सत्वरं भवति।।
अर्थात् एक सुन्दर और श्रेष्ठ कविता वही है जो अपने श्रोता, पाठक, सहृदय का उसी प्रकार साधारणीकरण कर दे जिस प्रकार एक सुन्दर स्त्री अपने पति के हृदय को आल्हादित कर उसका सरलीकरण कर देती है, उसे आनंन्दित कर देती है।। ऐसी आनंद की अनुभूति प्रदान करने वाला गुजराती से हिन्दी में अनूदित एक काव्य संग्रह ‘ऑंख ये धन्य है‘ अभी हाल में चर्चा में आया, जिसके रचनाकार हैं हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी। मूल रूप से इस संग्रह की निर्मिती गुजराती में हुई है, लेकिन उसे हिन्दी पाठकों तक पहॅुंचाने का महनीय कार्य डॉ0 अंजना संधीर ने किया है। उनका यह प्रयास इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्यों कि एक श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ को एक श्रेष्ठ कवि के रूप में लोगांे तक पहॅंुचाने कार्य इसी काव्य संग्रह से अवश्यम्भावी रूप से किया जा सकेगा। कवि नरेन्द्र ने अपने वैयक्तिक एवं निर्वैयक्तिक जीवन काल में जो भोगा, जिन हकीकतों से उनका आत्मसाक्षात्कार हुआ, उसे उन्होंने अपने सिसृक्षण के दौरान जस का तस बयॉं करने के साथ ही अपने व्यक्तित्व की झॉंकी सहज पाठकों के सामने प्रस्तुत कर दी है। उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज को, अपने गहन अनुभव को बगैर किसी आवरण के, प्राकृतिक तौर पर ही अभिव्यक्त किया है। ‘‘शृंगारित शब्द नहीं मेरे/नाभि से प्रकटी वाणी हॅूं।/करता हॅूं इस धरती से प्रीत/खामोशी का आनंद लेते हुए/गाता हॅूं गीत।‘‘ मोदी की प्रत्येक कविता जल में बुलबुल के माफिक पाठक के समक्ष प्रस्तुत होती है, और हर कविता एक नये बुलबुले मंे प्रदर्शित बिम्ब की तरह एक नया अनुभव, एक नयी बात सहृदय को दे जाती है। 
  कवि नरेन्द्र मोदी का यह कविता संग्रह ‘ऑंख ये धन्य है‘ उनके लंबे अनुभव और चिंतन से उपजी कविताओं का संकलन है। यहॉं चिंतन की ठोस जमीन तो है लेकिन वह विषय में इतना घुल-मिल गई है कि अंत में यहॉं एक मजबूत कविता की शक्ल ही हमारे सामने आती है। नरेन्द्र ने अपनी कविताओं में निरंतर एक नई व्यक्तिगत सजगता के कारण अपनी वैयक्तिक अनुभूतियों को निर्वैयक्तिक कर विभिन्न संदर्भों को पाठकों के समक्ष उठाया हैं। ‘‘सोलह बरस की रूपवती कन्या जैसी नदी/आज क्रोधित हो बाघिन हो गई है/वर्षा के कारण वो बेहद उच्छृंखल हो गई है/उसे किसी की लाज, शर्म नहीं है/अपना संयम गॅंवा/पागल स्त्री की तरह........................विनाश करती प्रकृति/हमें अपना विकृत परिचय देती है/हॉं, जल के जानलेवा जुनॅूंन का।‘‘ वही समाज, वही परिवेश, वही समस्याएॅं, वही विषय लेकिन एक नये रूप में अलग-अलग किस्म की कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत करना नरेन्द्र की मौलिक काव्य प्रतिभा की विशेषता है, जो इस काव्य संग्रह में स्पष्ट होती है।
ठेठ गॉंव से लेकर अपार्टमेंट और शहरी परिवेश की चमक-दमक तथा देश का यथार्थ तक उनकी निगाहों में, इसीलिए कवि मन को सुकून नहीं पाता, कवि नरेन्द्र के इस लंबे अंतराल का यह अनुभव को अपनी कविताओं संजोया है-मन में मेरे जंगल लगे हैं/अंग-अंग में आग/जंगल में मैं ढॅंूढ़ता हॅूं/हरा-भरा वह बाग।/सुखी देखे, दुःखी देखे/देखे रोगी भोगी/माया जिसने छोड़ी/उसी काया निरोगी।/झन-झन, झन-झन तार-तार पर/बजता बिना छिड़ा सा राग/मन अपने को समझाता हॅूं/जाग अभी तो जाग। नरेन्द्र की कविताओं में एक विशेष दर्शन पक्ष उभर कर हमारे सामने आता है। वह जानते हैं कि जीव जगत सब एक छलावा मात्र है, इस संसार में व्यक्ति सर्वत्र सुख की अनुभूति कर सकता है, जो माया के वसीभूत नहीं है, अन्यथा दुःख ही दुःख है, अतः रचनाकार पाठक को चेताता है कि अब तो जाग जाओ।
नरेन्द्र मोदी के इस संग्रह में चिंतन बहुत गहरे में धॅंसकर आया है। यह समाज और समय क्यों कठिनतम होता जा रहा है, वे इसे भली-भॉंति जानते हैं और उसे इशारों में कहना भी चाहते हैं। ‘‘ धरा/की पुकार है/गगन की पुकार है/पथ भूले हुए पंथ हैं और पार्थ को ललकार है/सम्प्रदायों में बॅंटता मानव/मानव से बनता है दानव/हुंकार, हो-हल्ले से/हुए हैं बहुत से हंगामे यहॉं/अभिमान की खड़ी दीवारें हैं यहॉं/और सपनों का संहार है/ललकार है, पुकार है।/समानता की बातें, बातें ही रहीं/और एकता ही पिसती गई/संविधान के बंद दरवाजे और ईर्ष्या-द्वेष की खाई रह गई/ऑंसू चारों ओर हैं/और सब जगह अंधकार है। अपने देश, अपने संविधान, अपनी संस्कृति, मानवीय पतन की बेइंतहा चिंता ही नरेन्द्र मोदी को हमारे समय का एक जरूरी कवि बनाती है, और उनकी कविता को एक महत्त्वपूर्ण कविता। 
आम जीवन की बेबाकी से जिक्र करना और उनकी विसंगतियों की सारी परतें खोल देना यह विवेक और चिंता की ऊॅंचाइयों का परिणाम होता है। आज जो साहित्य रचा जा रहा है, वह लेखन की कई शर्तों को अपने साथ लेकर चल रहा है। एक तरफ जिन्दगी की जहॉं गुनगनाहट है, वहीं दूसरी तरफ जवानी को बुढ़ापे में तब्दील होने की जिद्द भी है, इन्हीं सब शर्तों के अनेक रंगों को अपने इस कविता संग्रह में पिरोने का साहस श्री नरेन्द्र मोदी ने किया है। ‘‘कोई पंथ नहीं, ना ही सम्प्रदाय/मानव तो बस है मानव,/उजाले में क्या फर्क पड़ता है, दीपक हो या लालटेन।‘‘
उनका यह संग्रह वीरान जिंदगी के कब्रिस्तानों पर एक ओर जहां जीवन और मुहब्बत के गीत लिखता है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान जीवन की विसंगतियों से लड़ने की ताकत भी देती है। संग्रह की कविताओं के रंग इन्द्रधनुषी हैं, लेकिन सारी कविताओं का मूल स्वर जीवन और जीवन तथा जगत का यथार्थ है। इससे प्रतीत होता है कि कवि ने अपनी कविताओं में जिया ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है। इन दोनों क्रियाओं ‘जीना और भोगना‘, ऐसी काई में पगडंडी है, जिस पर फिसलने का डर हमेशा बना रहता है। मोदी जी ने स्वयं को फिसलने नहीं दिया है, जो भी लिखा है मजबूती के साथ और साफ-साफ लिखा है-‘‘भाग्य को कौन पूछता है यहॉं?/मैं तो चुनौती स्वीकारने वाला मानव हॅूं।/मैं तेज उधार नहीं लॅूंगा/ मैं तो खुद ही जलता हुआ लालटेन हॅूं।/मैं किसी का मोहताज नहीं/मुझे मेरा उजाला पर्याप्त है। अंधेरे की लहरों को काटे/कमल के तेज-सा स्फूर्तिवान है।‘‘ सच में उत्साह आदमी को किरदार की आईनासाजी का हुनर सिखाता है। यह हुनर मोदी जी के लेखन का आत्मबल है। संग्रह की कविताओं के पाठ के बाद यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 
यह तो माना ही जा सकता है कि मोदी जी की कविता दुनिया की आमजीवन शैली के आसपास घूमती है, लेकिन यह पूरे तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि मोदी जीवन की दुनिया के बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। इस संग्रह के अवलोकन के बाद स्पष्ट होता है कि इनका लेखकीय केनवास काफी बड़ा है, जीवन हरेक आहट नए-नए दृश्य तलाश करती है, जिसमें भोर की पहली किरण के साथ हसीन उजालों की सुगबुगाहट मिलती है। विरह और वियोग का एक छटपटाता हुआ पन्ना भी खुलता है और उस पन्ने पर बडत्रे ही सलीके से मोहब्बत का नाम लिखा जाता है। कुल मिलाकर भावस्थितियों की विविधता मोदी जी की कविताओं विपुल मात्रा में देखने को मिलती हैं कहीं बेबसी है तो कहीं कर्मोत्साह है। कहीं दैन्य है तो कहीं आक्रोश है। कहीं चीख है तो कहीं मूक संगीत है। कुल मिलाकर कवि की हृदय-तन्त्री से निकले हुए हर भाव का समायोजन संग्रह की कविताओं में बड़ी कुशलता और सटीकता से हुआ है। ‘‘अॅंधेरे के कागज पर/मैं एक सरोवर रेखांकित करता हूॅं/सरोवर पर झुकती है एक डाली/भॅंवरों की गुंजन लेकर/गहरे अंधकार को हल्का करने/मैं बनाता हॅूं एक चन्द्रमा/देता हॅंू, उसको नीला, आसमानी रंग/सरोवर के शांत जल जैसा/अचानक..........बैसाख की दुपहरी सूरज/कागज़ को जलाकर राख कर देता है/और मेरे हाथ में/कॉंप जाता है ब्रश-/मेंढ़क की चित्कार/मौसम के सपने/सपनों का मौसम/सभी कुछ भाप हो जाना।‘‘
प्रायः समझा जाता है कि कवि कल्पनाशील होता है और भविष्य के सुनहरे आदर्शवादी ताने-बाने बुनने में उसकी अधिक दिलचस्पी रहती है। ऐसा मोदी जी की कविताओं के परिप्रेक्ष्य में भी आंशिक सत्य हो सकता है लेकिन विशेष तौर पर मोदी जी की कविताएंॅ ठोस यथार्थ और भोगे हुए कड़वे सत्य को भावाकुलता के साथ उद्घाटित करने वाली जीवंत शब्द रचनाएॅं हैं,‘‘कारगिल/पहले भी गया था,/टाइगर हिल/पहले भी देखी थी/तब/राजाधिराज के श्वेत मौन को/जी भर कर देखा था/आज/हर चोटी/गर्जती थी/बोम्ब, बंदूह की गॅूंज से/बर्फ की शिलाओं पर धधकते अंगारों जैसे/सेना के जवानों को देखा/यहॉं/हर जवान/किसान था/जो अपने आज को बीज रहा था/अपने खून से सींच रहा था/ताकि हमारा कल/मुरझा न जाए/हर जवान की ऑंख में/उमड़ते सौ करोड़ सपने देखे/अपनी ऑंख की पलक से/मौत को जकड़ने वाले/वीर देखे/और यमराज को,/इन वीरों के चरण चूमते हुए देखा था।‘‘
मोदी जी के इस कविता संग्रह में विरोधाभाशी शैली का विशेष तौर पर इस्तेमाल किया गया है, आम कवियों की कविताओं की तरह मनोभावों को व्यंग्य के नुकीले बाणों, कैक्टस के नुकीले कांटों की तरह पाठक के हृदय को भेदने का कार्य मोदी की कविताओं ने नहीं किया है। उनकी कविताएॅं गुलाब के फूल के स्पर्श की तरह एक कोमल छुअन पाठक के हृदय को दे जाती है, वह सहृदय में उत्पन्न कर देती है, एक सिहरन, एक सबक, एक खुशबू वह भी स्मूथली। उनकी कविताओं में यह क्वालिटी खूब देखने को मिलती है कि वे पाठक को वगैर झिंझोडे़ ही बहुत कुछ कह जाती हैं, और उन्हें बहुत-कुछ सोचने पर भी मजबूर करती है- ‘‘स्वाभिमान-झूठ बोले, कौआ काटे/इसलिये हमें सत्य बोलना जरूरी है/सत्य ही तो हमारा स्वाभिमान है/मजबूरी नहीं/सत्य नहीं बोलें/तो कोयल की कुहूक को/मरी हुई मछली की तरह/कौआ चोंच,/मार-मार कर नष्ट कर देगा/अफवाहों पर आधारित समाचार/सुबह-सवेरे उगते हैं काले सूरज की तरह/सत्य से सत्याग्रह तक की/अपनी यात्रा में हमें मिलते हैं/बिना पैर चलते/प्रवासियों के पद्चिन्ह/केवल भीड़, टोलियॉं।‘‘
मोदी जी का यह अनूठा काव्य-संकलन ‘ऑंख ये धन्य है।‘ काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है। इसके लिए में मोदी जी को तो बधाई देना ही चाहॅंूगा, साथ ही में डॉ0 अंजना संधीर को भी उतना ही सधन्यवाद ज्ञापित करना चाहॅंूगा कि उन्होंने मोदी जी के इस कविता संग्रह को इतने सुन्दर और सहज ढंग से अनुवादित किया कि कही लगता ही नहीं कि इस पुस्तक को कोई अनुवाद हुआ होगा। स्त्रोत भाषा की किसी विधा को और विशेष तौर पर कविता को किसी लक्ष्य भाषा में स्थानांतरित करना और वह भी भाव बदलने न पाये वास्तव एक दुस्कर कार्य है, और दुस्कर कार्य को बड़े ही सहज रूप से करने का प्रयत्न अंजना संधीर ने किया, उनका यह कर्म भी सिसृक्षु की तरह ही एक तपश्चर्या है। वे वास्तव में बधाई की विशेष पात्र हैं। आशा करता हॅंू कि वे आगे भी इसी तरह के हिन्दीत्तर भाषी महत्त्वपूर्ण कविता संग्रहों और अन्य ग्रंथों को अनुवाद कर पाठकों के समझ ला सकेंगी और हिन्दी की समृद्धि कर सकेंगी। 
अंत में पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि ‘ऑंख ये धन्य है।‘ की कविताएॅं राष्ट्रीयता को पोषण प्रदान करने के साथ ही प्रगतिवादी विचारधारा का भी समाहार हैं। उनकी सम्पूर्ण कविताओं की विशेषताओं को चंद शब्दों में इस प्रकार बयॉं किया जा सकता है कि एक तरफ उनकी कविताओं में मीर के व्यंग्य पुट हैं तो दूसरी तरफ स्वामी रामतीर्थ का मस्तानापन, अल्हड़पन, भावुकता और भावावेश। इसके अलावा निराला की अभिव्यंजना शक्ति और लाक्षणिकता, पंत की दार्शनिकता और विचारशीलता, लोकमान्य तिलक के केसरी की सम्पादकीय जैसी निर्भीकता, विचार स्वतंत्रता और पैनापन इन सबका सम्मिलित प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इस संग्रह की कविताएॅं पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होंगी। संग्रह की तमाम कविताएॅं पठनीय और शिल्प के हिसाब से अत्यंत सटीक हैं, साथ ही कविताओं में छन्दात्मकता और मुक्त छंद दोनों को ही लावण्य देखते ही बनता है।
                       प्रस्तुतकर्ता
डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया



                    

मोदी युगीन लोकधर्मिता की स्पष्ट बयॉंवाजी ‘मोदी युग‘- प्रो. संजय द्विवेदी की पुस्तक मोदी युग की समीक्षा


अभी हाल ही में प्रकाषित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री संजय द्विवेदी की एक पुस्तक ‘मोदी युग‘ काफी चर्चा में है। सौभाग्य से यह पुस्तक मुझे भी प्राप्त हुई। इस पुस्तक का अवलोकन करते समय संजय जी के आलेखों से जब मैं रू-ब-रू हुआ  तो मुझे लगा कि इस पुस्तक को लेकर अभी तक बहुत से लोगों ने बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें कहीं लेकिन कुछ महत्त्वपूर्ण बातें अभी भी अधूरी रह गयी हैं, और उनमें से पहली यह है कि यह पुस्तक मोदी जी के तीन साल के कार्यकाल का निष्पक्षीय दस्तावेज है, न कि किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित चारणकालीन किताब। जिसमें मोदी युगीन लोकधर्मिता को बड़े ही स्पष्ट ढंग से व्यक्त किया गया है।
संजय जी सच को सच कहना जानते हैं, इसीलिए इस पुस्तक में उन्होंने पिछले तीन वर्ष में मोदी जी के लिए जो लगा वह कह दिया। उसमें कुछ सकारात्मक है, तो नकारात्मक भी, लेकिन फिर भी  इस पुस्तक के लेख बड़े ही सधे और सुलझे हुए हैं। हो सकता है कि कुछ लोग इस पुस्तक में राजनैतिक पूर्वाग्रह खोज लें, वे इसके लिए स्वतंत्र हैं। यह पुस्तक जो कहती है सच कहती है, सच के सिवा कुछ नहीं। यह एक तरफ मोदी सरकार को राह दिखाती है, तो दूसरी तरफ आईना भी, साथ ही यह सत्ता की खुमारी में सोए हुए लोगों की तंद्रा भी जाग्रत करती हुई नजर आती है। इसकी लोक प्रसिद्धि के कारण ही पहले-पहल प्रकाशन से प्रथम संस्करण के तुरंत बाद ही इसका दूसरा संस्करण भी यश प्रकाशन से अभी हाल ही में प्रकाषित हुआ है। 
आइए अब बात विस्तार से बात करते हैं पुस्तक के पैरामीटर की। दो समीक्षाओं, 63 आलेखों सहित कुल 246 पृष्ठों में अपनी विषय-वस्तु को समाहित किए यह पुस्तक राजनेताओं और राजनीति के जातीय जीवन का अंकन करती हुई नजर आती है। इसमें मोदी सरकार के त्रिवर्षीय कार्यकाल का ब्यौरेबार चित्रण जितना विस्तृत है, उतना ही उसका सूक्ष्म संवेदनात्मक अंकन भी है। ‘मोदी युग‘ में भाजपा के स्वर्णिम समय का एवं प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की चारों ओर फैली प्रसिद्धि का उल्लेख तो किया ही गया है, साथ ही जातिवादी राजनीति के बुरे दिनों का भी स्पष्टीकरण किया गया है। मोदी सरकार की चुनौतियॉं, उसकी गलतियॉं, उसकी अच्छाईयॉं, जातिवादी राजनीति, काश्मीर मुद्दा, जेएनयू प्रकरण, आभासी साम्प्रदायिकता, भारत-पाक रिश्ते, सत्ता को मानवीय और जनधर्मी बनाने की चुनौतियॉं, शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति और सरकार की भूमिका, कालेधन का मुद्दा, मेक इन इंडिया की थ्योरी, जनतंत्र में अवसरवादिता और परिवार वादिता का स्पष्टीकरण ही इस पुस्तक का आधार है।
मोदी और इतर राजनैतिक पेचों का बेबाकी से जिक्र करना और इसकी विसंगतियों की सारी सच्चाईयॉं परत-दर-परत खोल देना यह विवेक और चिंतन की उॅंचाईयों का परिणाम है, तथा इन्हीं उॅंचाईयों को छूने का प्रयास संजय जी की इस पुस्तक में किया गया है। वे अपनी इस पुस्तक के माध्यम से सरकार को नए उत्साह और समय को सकारात्मक ढंग से लेेने की सलाह देते हैं न कि शासन के कंधों को कमजोर करना चाहते हैं। 
संजय जी की यह पुस्तक लेखन की कई शर्तों को अपने साथ लेकर चली है। इसमें सबसे प्रमुख शर्त है सपाट बयानी। इसी के चलते संजय जी ने जो कहा है वह बड़ी बेबकी से कहा, चाहे वह सरकार के पक्ष में हो या विपक्ष में। इस पुस्तक में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल की सफलता है, वहीं दूसरी तरफ कई गलतियों के प्रति सचेत रहने का आग्रह भी है, वहीं विपक्ष की बेचैनी, जद्दोज़हद और किंकर्तव्यविमूढ़ता का भी बड़ी ही निर्भीकता से विवेचन किया है। कुल मिलाकर कई अनेक रंगों को अपनी इस एक पुस्तक में पिरोने का साहस संजय द्विवेदी जी ने किया है। इनका लेखकीय कैनवास काफी बड़ा है। इनके लेखों में मोदी युग की हरेक आहट के नए-नए दृष्यों को तलासा और तरासा गया है, जिसमें सिकुड़ते राष्ट्रीय दलों के जनाधार, भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग, चुनावों में मीडिया की भूमिका, मोदी युगीन आलोचक और उनकी आलोचना में हड़बड़ाहट, वचनीयता से कर्मणीयता की ओर जाती भाजपा, शिक्षा और राजनीति से मोदी के सरोकार, जहरीली जुबान से घायल लोकतंत्र के स्पष्टीकरण के माध्यम से इस पुस्तक में भोर की पहली किरण के साथ हसीन उजालों की सुगबुगाहट मिलती है। किसी एक कौने में पड़ा हुआ असफलता और आलोचना का एक छटपटाता हुआ पन्ना भी खुलता है, और इस पन्ने पर बड़े ही सलीके से मोदी युगीन दासतॉं लिखी जाती है। इस पुस्तक में कश्मीर भी अछूता नहीं रहा है। इस पुस्तक का एक लेख ‘कश्मीर: इतिहास में अटकी सुईयॉं‘‘ सामासिकता और सामयिकता से परिपूर्ण है। हम जानते हैं कष्मीर में चाहे पनपता आतंकबाद हो या उससे जनित एक विशेष जन-समुदाय के ‘विस्थापन‘ की विवशता या धारा 370, यह कश्मीर की ही नहीं सम्पूर्ण भारत वर्ष की समस्या रूप में आज सामने है, और बड़े ही लम्बे विमर्श का विषय है, लेकिन इस समस्या को सुलझाने हेतु भाजपा के सार्थक प्रयास, और आलोचना करने के लिए आलोचना करने वाली विपक्षी पार्टियों की मनःस्थिति का उल्लेख बड़े ही प्रभाव पूर्ण ढंग से किया है। कुल मिलाकर ‘मोदी संस्कृति को केन्द्र में रखकर जो बिम्ब इस किताब में उकेरे गये हैं, वे प्रभावपूर्ण तो हैं ही साथ ही राजनीति जनित आक्रोश और आकुलता को बड़े ही सजीव तरीके से रूपयित भी करते हैं। अनूभूयमान यथार्थ के माध्यम से नरेन्द्र मोदी के पिछले तीन वर्ष के कार्यकाल और उनकी स्थिति को समझने-देखने की क्षमता संजय जी की अद्भुत प्रतिभा/मनस्विता का परिचय देती है।
विरोधाभासी शैली इस्तेमाल इस पुस्तक की खास पहचान है। व्यंग्य के नुकीले बाणों, कैक्टस के नुकीले कांटों की तरह पाठक के अन्तर्मन को छूते हुए उसके मस्तिष्क में एक कौंध जगाना यो एक सरल कार्य तो नहीं है, लेकिन इस किताब में यह ‘खूबी‘ बखूबी देखने को मिलती है। जो पाठक को ही नहीं झिंझोड़ती बल्कि सत्तासीन और सत्ताच्युत को भी बहुत-कुछ सोचने और विमर्श करने पर मजबूर कर देती है।
भारतीय राजनीति के इस त्रासदीय युग में मोदी की प्रतिष्ठा ने विपक्ष के ही नहीं बल्कि अन्य शत्रु देशो के शासनाध्यक्षों के मन-मस्तिष्क को बहुत गहरे तक आक्रांत कर दिया है। मोदी पीड़ा उनके रोम-रोम में समा गई है। क्यों कि जो वह सोच भी नहीं पाये वह मोदी ने कर डाला। मोदी युग की त्रिवर्षीय सफल स्मृतियों से लेकर, संघ की वास्तविक स्थिति और विपक्ष के दावपेच इस पुस्तक के लेखों में उभर-उभर कर सामने आते हैं। 
बहुज्ञता और वैविध्य ‘मोदी युग‘ में देखने को मिलता है। इसमें कहीं विपक्ष की बेबसी है तो कहीं मोदी सरकार का कर्मोत्साह है। कहीं सरकार की दीनता है तो अकर्मण्यों का आक्रोश। कहीं कश्मीर की चीख है तो, कहीं जनता का मूक संगीत।  कुल मिलाकर इस पुस्तक में मोदी युगीन हर अनुभूति का समायोजन इस पुस्तक के विभिन्न लेखों में बड़ी कुशलता और सटीकता से हुआ है।  इसीलिए इस पुस्तक को पढ़ने के बाद फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आंचल‘ में निहित वह कथन याद आ जाता है, जो इस पुस्तक पर भी सार्थक होता है‘ कि इसमें ‘‘फूल भी हैं, शूल भी हैं, धूल भी हैं, गुलाब भी, कीचड़ भी, चन्दन भी, सुन्दरता भी है, कुरूपता भी, संजय जी किसी से भी दामन बचा के निकल नहीं पाए।‘‘  वैसे देखा जाए तो सच का उत्साह, आदमी को किरदार की आईनसाजी का हुनर सिखाता है। यह हुनर द्विवेदी जी लेखन का आत्मबल है अतः कहा जा सकता है कि संजय जी की यह पुस्तक ‘मोदी युग‘ एक प्रकार की युगध्वनि है, जो मोदी जी की लोकप्रियता को समझने के इच्छुकों को सचमुच एक तोहफे के समान है। अपनी विशिष्ट भावाभिव्यक्ति तथा मोदी युगीन विषय-वस्तु की दृष्टि से यह पुस्तक न केवल पठनीय बन पड़ी है, अपितु मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करने वाला एक सुचिन्त्य एवं संग्रहणीय दस्तावेज भी बन पड़ा है।
                                                                डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया
                                            व्याख्याता, शा0 नेहरू महाविद्यालय, सबलगढ़
                                           जिला मुरैना, मध्यप्रदेश
               घर का पता-चरोरे पाड़ा, बड़ा बाजार सबलगढ़, जिला मुरैना मध्यप्रदेश 476229



यह लाँकडाउन है,

यह लाँकडाउन है,

चल पड़े,
इसे लगते ही
वे मीलों के सफर
पैदल ही तय करने
कोई सौ, कोई पाँच सौ,
कई हजारों की दूरी ,
हालत खस्ता,
पस्त
रक्तल्प धमनियांँ
और शिराएँ
पैर अंकिश्त,
पेट चिपका
पीठ से,
अधोमुख
और
दिल की धड़कन डाउन है,
यह लाॅक डाउन है

झुलसा चेहरा
लथपथ काया
पैरों में
विवाँई
गहरे घाव
छालों के साथ
रक्त का आखिरी
कतरा
बस
दौड़ रहा है
पारे की एक बूँद की तरह
जीर्ण देह में,
एक आस
घर पहुँचने की
मंजिल दूर
विदीर्ण हृदय है,

पर क्या करना उन्हें
जिनके सर पर क्राउन है
यह लाॅक डाउन है
उपार्जन की
ऊम्मीद पर
चले थे
शहर की ओर
छिन गया
सब कुछ,
किसी को बेचनी पडी़
अपनी पायल,
तो किसी को अपने बैल
कइयों को
खुद ही जुतना पडा़,

नौनिहालों
को कंधों बिठाये
वत्सला
और
माँ को पीठ पर
लादे पुत्र

खाली पेट,
एक मुट्ठी
भुँजे चने
कुछ सिके आटे

भरपूर उम्मीद
के बल पर
कर रहे मैराथन
उन्हें नहीं पता
पुरस्कार
स्वरूप
जायेगी जान
यह
मौत का कामडाउन है|
यह लाॅक डाउन है|

निस्पृह
तीन दिन बाद
खाना देखकर रो उठती है
बदनसीबी
और दिल
दहल जाता है
हमारा,
अज़हल
इख्तिराई बयानों
को सुनकर
लगता है
खाल उतारकर
चमडा़
रंगने
की तैयारी है,
झूठे भरोसे
आश्वासनों ने
छला उन्हें
वहाँ चर्बआखोर निगहबान है,
यह लाॅक डाउन है|
इंतज़ाम के
अख़लकंद
से मूर्ख बनती
गरीब अवाम,

मधुप की तरह
जिसका
सार शहद
निचोड़कर
छोडा़ गया
झुण्ड में
मवेशियों के माफिक
भूख से रिरियाती हुईं
इस तपती गर्मी में
बदइंतजामी के शिकार
इनकी आफत में जान है,
नींद
कैसे आती होगी
उन्हें
जो इस देश के हुक्मरान है|
यह लाॅक डाउन है| -भूपेन्द्र हरदेनिया

शब्दार्थ-अंकिश्त-जली हुई लकड़ी
निष्पृह-जो मिल जाये उसी पर गुज़ारा करना
इख्तिराई-फर्जी
चर्बआखोर-मुफ्तखोर
अख़लकंद-झुनझुना
अज़हल-मूर्खतम
निगहबान-देखरेख करने वाला


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मैं मजदूर हूँ

मैं मजदूर हूँ
आज कंटक हूँ शासन के लिये
शोषकों के लिये अब मुसीबत, सिरदर्द के सिवाय कुछ नहीं|
चिंतकों के लिये विमर्श, उलाहना का मौका
आम जनता के लिये, एक दुख की खबर|

मैं मजदूर हूँ
मेरा सम्बन्ध रहा है सिर्फ़ वेदना से ही
मिलती रही वह सदियों से
किसी भी रूप में
चाहे वह दर्द हो
या दर्दनाक मौत के रूप में|

मैं मजदूर हूँ
बदनसीबी पीछा नहीं छोड़ती मेरा,
भूख-प्यास के बहाने अब कफन बनकर
मंडराकर
आ रही है कहीं भी
चाहे वह पटरी
जिसके सहारे निकला था गाँव,
या उस पर दौड़ती शासन की वह ट्रेन
जिसमें बैठकर
बस पहुँचने ही वाला था
अपने घर,

मैं मजदूर हूँ
अपने ठिकाने पर पहुँचने से
पहले ही हत्या कर दी गई मेरी
फिर किसी साज़िश के तहत
मैं मारा गया हूँ|

काल तुझसे शिकायत है मेरी

एक कविता शिकायत भरी-
(गुरुदेव की याद में)

काल तुझसे शिकायत है मेरी
तू क्यूँ छलता आया है,
इस सम्पूर्ण मानव सृष्टि को
मुझे, मुझसे
मेरे अपने मेरे सपने,
जिसे हमेशा ही अपने छलावे से,
तूने छीना है मुझे,
मुझसे ही मेरे अपने
और मेरे सपने|

मेरा और उनका
समय आने से पहले
एक उत्तम गेंदबाज
की फेंकी गई तुम्हारी
गेंद पर
हमेशा ही चकमा खाकर
हुये हैं खेल से बाहर
मैं, मेरे अपने
और मेरे सपने

तूने नहीं होने दिया साकार
उन सपनों को जो मैंने देखे थे
अपनों के लिये
उलट
घनी धुंध का डालकर पर्दा
कर दिया उन्हें ओझल
और बिछड़ गया मैं
और वो मेरे अपने, मेरे सपने|

सूनी डायरी के नीरस पृष्ठों सी
मेरी जिंदगी
जिस पर लिखी जानी थी
कोई खुशी, कुछ प्रेम
कई फ़लसफ़े
कोई तरक्की
या
कुछ खट्टी मीठी यादें, कुछ इबारतें
लेकिन तूने नहीं बख्शा
जला दिया उन्हें
अपनी प्रचंड अग्नि से
कुछ इस तरह
कि खुलते जाते
जलते जाते
वे पन्ने एक-एक कर, बारी बारी से
एक-एक दिन की तरह
अलिखित-अदिखत|

नहीं चखने दिया स्वाद इसका तुमने|
गला दिया
जैसे पिघलते मोम सी टपकती जिंदगी|
तेरे गाल में समा चुके
मेरे अपने मेरे सपने|
तेरे छल से छले गये
हमेशा वे और खुद मैं भी|

तुम निष्ठुर
इतने क्रूर कैसे हो सकते हो
क्या तुम्हें मालूम नहीं
मेरे अपनों का जाना
मेरे जाने जैसा ही है
वह मेरे अपने ही थे
मेरे सपनों में शामिल
कुछ इस तरह कि
वह मेरे अपने नहीं
उनमें मैं ही था
और वो मुझमें
पर वे नहीं गये कहीं
गया फिर से मैं ही
अब मैं फिर मर चुका हूँ
और हमेशा
मैं ही........
अधूरा जीवन लेकर
कई अधूरी ख्वाहिशों के साथ
इसकी शिकायत है
और हमेशा रहेगी
काल तुझसे शिकायत है मेरी

डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया

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दि लाॅकडाउन न होता तो?



वर्तमान महामारी के इस दौर में एक निर्णय से हम घरों में कैद होकर रह गये, कई कार्य और कई योजनाएँ धरी की धरी रह गई| चारों तरफ एक ही भय और वह है सिर्फ और सिर्फ संक्रमण का| सियासत की साजिशों के चलते विभिन्न राज्यों के बस स्टेंड, रेलवे स्टेशन, चौराहों और सड़कों पर हजारों मज़दूरों का हुजू़म सभी ने देखा, जिसमें कईयों ने इस दौरान अपनी जान गँवाई|  उनका दर्द, उनकी वेदना को शब्दों में नहीं ढाला जा सकता| पर हमारे दिमाग में एक और भी प्रश्न  बार बार दस्तक दे रहा है कि क्या मोदी जी को यह लाॅकडाउन नहीं करना चाहिए था, क्या उनका यह निर्णय गलत था, क्या उनको इसके लिये किसी योजना हेतु इंतजार करना चाहिए था| क्या वह इसके लिये वह हाई प्रोफाइल मीटिंग लेते | पर आपने यह कभी सोचा है अगर यह लाॅकडाउन के निर्णय को सही समय पर न लिया गया होता तो क्या होता| किसी भी कार ड्राइवर को एक्सिडेंट होने की पूर्वास्था में कुछ सैकेंड का समय मिलता है, जिसमें वह अपने तुरत निर्णय और सूझबूझ से अपनी और परिवार की जान बचा सकता है| इसी प्रकार यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि इस लाॅक डाउन ने लाखों लोगों की जान बचा ली, अगर यह न होता तो हम सब,  हमारे अजीज़ और शायद आप सभी इस संक्रमण के शिकार होते| और आज  देश का जो वर्तमान आँकडा़ लगभग 118000 है, वह कई लाख होकर सारे विश्व के आँकडो़ं के रिकार्ड को तोड़ चुका होता| लाकडाउन में कुछ ढील का परिणाम यह हुआ कि अब यह आँकडा़ आसमान छूने लगा है| जब लाकडाउन था तब यह स्थिति है, सोचिये अगर यह न होता तो हम कहाँ होते| आज दिन ब दिन मरीजों की संख्या पहले की तुलना में अधिक वृद्धि कर रही है, लेकिन पूर्व में लगे लाकडाउन से अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ का वृद्धि अनुपात कम है| अतः लाॅकडाउन सही समय पर किया गया हिम्मत का निर्णय है, इसके लिये वर्तमान सरकार धन्यवाद की पात्र है| जो लोग इस समय राजनीति कर रहे हैं, घृणा और झूठ के साथ अफवाहों का वातावरण निर्मित कर डर और भय का माहौल पैदा कर रहे हैं, उन्हें अपने अंतर्मन में स्वयं झाँक कर देखना चाहिए कि कमी किसमें नहीं होती, क्या जो इस आपात स्थिति में केवल आलोचना में लगे हैं (कुछ कर नहीं रहे), उनमें कमी नहीं है, वे दूध धुले हैं, चाँद में भी दाग है लेकिन वह भी हमें अपनी शीतलता प्रदान करता है, और हम अपने प्रिय को उस दगीले चाँद से उपमित करते हैं, फिर हम तो आम इन्सान हैं| आप विचार कीजिये कि यदि लाॅक डाउन न होता तो क्या होता ? हम सब आराम से अपने कार्य कलाप तो कर रहे होते लेकिन इस महामारी से बेखबर होकर, और इसका हश्र क्या होता उसके लिये हम तीसमारखाँ विकसित देशों को देख सकते हैं| हम तो विकास के मामले में अदने हैं, जिस देश की छोटी छोटी तहसीलों में सामान्य पेट दर्द पर मरीज को रैफर कर दिया जाता है, वहाँ उन छोटे छोटे कस्बों में क्या हालात पैदा होते | कृपया दलगत, वाद, प्रतिवाद और पंथ की राजनीति से ऊपर उठकर माँ भारती के लिए कार्य करें, लोगों की सहायता के लिये कार्य करें, बाहर न निकलें,  यह सही समय है देश सेवा, जन सेवा का| जो नहीं कर रहे कोई बात नहीं, वे आत्म मुग्ध हैं, कभी करेंगे भी नहीं, वे इस महामारी में भी भ्रष्टाचार से कमाने की सोचेंगे| ये उन्हीं लोगों में से हैं जिन्होंने सरकार के आग्रह बाद इस दुर्भिक्ष में नौकरी से निकाल दिया| लेकिन समझदार वर्ग को देशहित में आगे आना ही होगा, विशेष तौर पर युवाओं को जो इस देश का भविष्य हैं, उन्हें अपना वर्तमान और बिगड़ते हलातों को सुधारना ही होगा|  कुछ निर्णय में सरकार से त्रुटि हुई है, कि लाकडाउन से पहले लोगों को यथास्थान सुरक्षित पहुँचाने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए थी,  पर हो सकता है कि इससे यह और विकराल रूप में होता और मरने वालों की तादाद भी कई गुना अधिक| मुझे लगता शत-प्रतिशत कोई नहीं दे सकता, आप और हम भी उस जगह होते तो शायद नहीं|  इतना ही कहना बेहतर है कि बीती ताहि बिसार देओ, अब आगे की सुध लेओ| अभी सरकारों के पास मौका है कि वे  पलायन करते हजारों पीडि़त लोगों को अविलम्ब मदद पहुँचाये, और उनके कष्ट को अपना कष्ट समझते हुए स्थानीय लोग भी आगे आयें| महामारी प्रकृति प्रदत्त हो या व्यक्ति प्रदत्त,  हमें उस स्थिति को सम्भालना चाहिए|  सबका साथ सबका विकास में केवल सरकार ही नहीं सभी को मिलकर सरकार और समाज में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करना होगा, वह भी व्यक्तिगत दूरी बनाए रखकर, तभी हम सब साथ साथ विकास के सोपानों प्राप्त कर सकते है, और इस महामारी से जीत पाएँगे|  भारतीय चिकित्सक, भारतीय पुलिस को, भारतीय सेना को, स्वयं सेवी संस्थाएँ जो सच्चे मन से इस देश और नागरिकों की सेवा और सुरक्षा में लगे हैं, वे सब सलामी योग्य हैं| उन योद्धाओं को हमें सम्मान देना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन की परवाह किए बिना ही दिन रात लोगों की सेवा की|

लेखक युवा चिंतक और शासकीय नेहरू महाविद्यालय, सबलगढ़ जिला मुरैना में व्याख्याता हैं|

शुक्रवार, 22 मई 2020

धरती रोती होगी-कविता

एक कविता धरती माँ पर

धरती रोती होगी,
जब
किया जाता होगा
उसके वृक्ष पुत्रों पर
धारदार हथियार से वार
भेदा जाता होगा
उसके वक्ष स्थल को
गोदा जाता होगा
कटि को|

धरती रोती होगी
जब
होता होगा उसकी
लता-पुत्रियों का चीर हरण
वे पड़ी रहती होंगी औंधी,
मृत,
मूल से कटी हुई|

धरती रोती होगी
जब
नदी रूपी उसकी धमनियों में
बहते हुए जल रूपी
रक्त को
किया जाता होगा प्रदूषित,
पैदा किए जाते होंगे
ब्लाकेज|

धरती रोती होगी
जब
अवैध खदानों और उत्खनन से
चीरा जाता होगा
उसके कलेजे को
करते जाते हैं उसे
मज्जाहीन,

धरती रोती होगी
जब
करते हैं उसकी आवोहवा
को दूषित
नहीं छोड़ते
साँस लेने लायक शुद्ध वायु|

धरती रोती होगी
जब
ट्यूबवेल और बोरवेल
के नाम पर किया जाता होगा
उसके शरीर में कहीं भी सुराख
बेवजह, बेतहाशा, बहाते हैं,
उसके रक्त को|

धरती रोती होगी
जब
धीरे धीरे सूखती जाती हैं
शिराएँ,
होती जाती हैं, रक्तहीन, 
खोखली, पोली
और फिर फट जाती होगी
सूखकर|

धरती रोती होगी
जब
हम नहीं लगाते कोई वृक्ष
नहीं करते फिक्र,
उसकी,
उस पर निर्भर जीव-जन्तुओं की,
करते जाते हैं
उनके निवास स्थानों का भी
अतिक्रमण
नहीं छोड़ते
चींटियों के भी रहने लायक
कोई जगह|

धरती
रोती होगी
जब हम नहीं समझते
प्यार को, अहसास को,
रिश्तों को, सम्बन्धों को,
करुणा और दया को|
जाति, धर्म, राजनीति
के नाम पर करते रहते
अपमानित,
लड़ते-लडा़ते रहते सदा
कर रक्तरंजित
एक दूसरे को,

हमेशा
अपनी कुटिलता, चालाकियों से
समझते रहते हैं,
स्वयं को बहुत शातिर
करते रहते हैं,
एक दूसरे से छलावा,
स्वार्थ के वशीभूत होकर
करते हैं रिश्तों को तारतार
मानवता को शर्मसार|

लेकिन
आज
धरती नहीं रो रही है,
वह दिखा रही है
अब अपने रंग,
कर रही प्राकृतिक न्याय|

मिल रही
करनी की पूर्ण सजा
घर में बंद मानव को
जो बहुत दुखी है,
अपने भविष्य को लेकर,
जिसने नहीं की
पृथ्वी के भविष्य की चिंता
कभी,

धरती आज बेहद खुश है
दिख रहा हिमगिरि साफ
मीलों दूर से,

कर रहे मयूर नृत्य,
इंसानी निवासों के नज़दीक
विचरण करते जंगली जीव
याद करतेअपनी पुरानी स्मृतियांँ
यह उनका भी, घर रहा होगा कभी,
जिसे मानव ने लिया छीन,

आज वह भी कैद है
झाँक रहा खिड़की से ही
बेबस होकर
अपने किये पर
पछताकर|

प्रकृति खिलखिला रही है|
अब
मानव का हस्तक्षेप
कम हो गया है|

-डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया

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बुधवार, 13 मई 2020

जिंदगी एक झूला है

ज़िंदगी एक झूला है साहब
अगर पीछे जाए
तो डरो मत
वह आगे भी आयेगा
वह जितना पीछे जायेगा
उतना ही आगे आयेगा
उसी वेग से
बस हौसला रख

रख यकीं
उस ऊपर वाले पर
और करता रह अपना काम
सहजता से,

वे मोटे दरख़्त
उनके पुष्पजों
के मानिंद
जो झेल कर झंझावातों को
हिलते रहते हैं खुशी से
और गिरकर भी उग आते हैं
कई बार उसी जमीं पर ,
बस जज़्बा रख

जैसे करती रहती हैं
नन्हीं चीटिंयाँ अपने अंडों
और अपने आहार की
उचित व्यवस्था
उठाये रहती हैं उनका भार
इधर से उधर, उधर से इधर,

वह रौंधी जा सकती
किसी के पैरों तले
फिर भी करती रहती है
अपना काम
भयमुक्त होकर
बस हिम्मत रख

अमृता
की लताएँ
प्रतिकूल मौसम में
पात हीन होकर भी
रहती है पेड़ों पर सवार
अपनी ऊर्जा को करती रहती है
सिंचित
और फिर हरी भरी हो जाती हैं
बनती हैँ रोग मुक्ति का उपाय|
बस भाव रख

होते हैं कई बार
कई काम
धीरे-धीरे
धीरज से
बस धैर्य रख

हमेशा से दुनिया
उम्मीदों पर
कायम रही है
बस उम्मीद रख

दैदीप्यमान नक्षत्र
गृह, तारागण
जिनकी चमक
ग्रहण से कम हो
जाती है,
लेकिन प्रतिभा कहाँ
छुपती है
अधिक समय तक
वे निकल आते हैं
फिर
अपनी तेजोमयता
और
शीतलता के साथ
बस चाहत रख

कहर फैलता है
तो फैलने दे,
फैला है
यह हर युग में,
और
हर बार-अमानव
इसे
फैलाते रहेंगे,
मानव बन
रख दूरियां
सम्भल कर चल
तैयारी रख
निकल
बस सावधानी रख

सूखी लकड़ी नहीं है तू
जो टूट कर गिर जायेगा
समय का इंतजार कर
झूले के वेग की तरह
ही
सूद समेत
सब मिल जायेगा,
बस आस रख

जिंदगी एक झूला है साहब
पीछे जायेगा
तो आगे भी ज़रूर आयेगा|
उसी वेग से
हवा की तरह
हल्का होकर|

-डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया

रविवार, 10 मई 2020

माँ

माँ
कहने को 
शब्द मात्र,

एक उद्बोधन

उस स्त्री के लिये
जो हमारी
जन्मदात्री है|

पर वह अपनी
गुरुता में
दुनिया के सभी
शब्दों से भारी है|

वह एक ध्वनि है
नाद के मामले में
सबसे अधिक
ध्वन्यात्मक,

एक अंतर्ध्वनि है वह
जो गुंजायमान
होती है
हृदय पटल से लेकर
आत्मा की 
उन गहराइयों में
जहाँ ऊँकार
सदैव विद्यमान रहता है,

परा तक पहुँचकर
वह शब्द घुला लेता
अपने में
परमात्मा के 
उस उच्चारण को भी
जिसे हम 
माँ से विलग कर
जपते हैं हमेशा
ऊँ के रूप में,

एक कठोर 
ढाल 
है वह
विपत्ति के समय
तूणीरों
और तलवारों
के समक्ष 
आकर
अड़ जाती
है 
उससे
जो उसके
अंश
के
लिए घातक है

माँ 
वह शब्द
जो
देयता में
सर्वोच्च
दानवीर है| 

उसके
समक्ष
हम
सब याचक हैं,

फिर भी 
हम 
भागते हैं
कई बार
काल के
और माया 
के वशीभूत होकर 
इस शब्द से,

लेकिन
वह करता रहता है
पीछा
हमेशा
और 
हम दौड़ते रहते हैं
अपने प्रमाद में,

हम दौड़ते रहते हैं
अपने 
सामर्थ्यानुसार,

पर थककर रुकते ही
यह शब्द
आ पकड़ता है
फिर हमारी
बाँह 
धँस जाता है
हृदय की
अंतरतम 
गहराइयों में फिर से
अपने
दुलार
वात्सल्य प्रेम
और बचपन 
की उन खूबसूरत 
यादों के साथ 
जिनका लौटना
संभव नहीं है
अब

वे
सारे बिम्ब
हमारे समक्ष
उभर आते हैं,
वैसे ही जैसे
हम जीते थे
तब
अपने अबोध रूप में
और फिर
हम
कहते हैं
सिर्फ़ और सिर्फ़
माँ! 
हे माँ!

लेकिन 
माँ नहीं होती 
फिर कई बार
हमारे
पास!

-भूपेन्द्र हरदेनिया

शुक्रवार, 8 मई 2020

औरंगाबाद में हुए एक ट्रेन हादसे में 16 मजदूरों की मौत हुई है। इस हृदय विदारक घटना पर मेरी एक कविता-


वे सोये थे
निश्चिंत भाव से
रेल की पटरी पर

उन्हें पता था कि 
समय के साथ
कुछ चीजें 
ठहर गईं हैं
अपनी जगह

पटरी भी शांत पडी़ है
ठंडी, शीतल
अंतर्ध्वनि रहित

उन्हें पता था
सब थिर है, 
अभी

चल रहे हैं तो
केवल हम|

और वे सो जाते हैं 
ठहराव के साथ
काल के भरोसे

अचानक!

रेल 
धड़ाधड़ निकल गई 
उनके ऊपर से

रेल के पहिये 
कुचलते चले गये,
उनको, 
उनकी पहचान को,
उनके भरोसे और ईमान को
उनके सपने और अरमान को
उनकी मेहनत को, 
घर पहुँचने की छटपटाहट को
कई यादों को
कुछ उम्मीदों को
बहुत सारे जज्बों
और जिजीविषा को,
खेतों की सौंधी सुगंध
चारों ओर हरीतिमा युक्त
गाँव के एहसास को 

पर यह पहली बार हुआ?

क्या  पहले कभी कुचले नहीं गये वे
हाँ यह सच है 
कि वे हमेशा से ही कुचले गये|
बस अब
रेल के पहियों ने उन्हें दबा दिया 

पर क्या वे कभी दबाए नहीं गये
रेल बड़ी क्रूरता से 
खाल उधेड़ती चली गई उनकी
लेकिन इससे पहले भी तो 
उधेडी़ जाती रही उनकी खाल

रेल के पहियों ने उडा़ दिया 
उनके चिथडो़ं को इस कदर
जिस तरह कभी 
साहूकार उडा़ दिया करता था
गाँव में,
जब वह किसान था
शहर में मजदूर बनने के ठीक पहले|

शहर ने भी कहाँ बख्शा उन्हें
शहर को इतना कुछ तो दिया उन्होंने
भवन, अट्टालिकाएँ, चौडी़ सड़कें
न जाने क्या कुछ
जिनमें उनके रक्तिम पसीने की बूँदे
समाहित हैं, 

पर शहर ने 
क्या दिया उन्हें
वहाँ भी वे कुचल दिये गये 
उसी तरह फुटपाथ पर
कई साहिबजादों द्वारा|

लगा दिया ग्रहण
उनकी आशाओं की किरणों पर
उन सेठों और मिल मालिकों ने
जिनसे जुड़े थे वे|

अब वे उन मजदूरों को
नहीं पहचानते
जिन्होंने दिन-रात मेहनत
कर अगणित व्यापार बढा़या
नक्काशीदार, स्वर्ण जडि़त
महलों को किया था तैयार,

पर साहूकारों ने नहीं की चिंता उनकी
अपनी पूँजी का तुच्छ हिस्सा भी
नहीं खर्च करना चाहते थे
इस महामारी में भी|

यन्त्रणा से ग्रसित
शायद इसलिए
अब वह सो जाना चाहते हैं
चिर निद्रा में
एक लम्बे आगोश में,
हमेशा के लिये|

सब कुछ लुट जाने
छूट जाने के बाद
अब कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें
वे जानते हैं 
मरना ही उनकी
नियति है|

शहर हो
मिल हो
चाल हो
फुटपाथ हो 
या
हो रेल की वह पटरी
जिस पर वह सो गया
या
वह गाँव 
जहाँ पहुँचकर
उसे मरना ही था
अकाल से
भुखमरी से
अभाव से
घृणा से
हीनता से
या
फिर किसी न किसी के हाथों

-डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया

गुरुवार, 7 मई 2020

भौतिकवाद

केवल एक ही जन्म मानने (this is the first and last life) वाली  पाश्चात्य धारणा से उत्पन्न विचार (बस यही एक जीवन है जिसे जितना जैसे मिले खा पीकर मौज करो, eat, drink and be marry) ही भौतिकवाद है। जहां से यह चला वहां लोगों ने इसे पचा लिया लेकिन हम इसे नहीं पचा पाए। अपितु यह हमारे जीवन पर दिनों दिन हावी होता चला गया।हमारे हाथ लगते ही यह अति भौतिकवाद में परिवर्तित होता चला गया।
आज हम सिर्फ भौतिक संसाधनों की सोचते है (घर होते हुए भी एक बड़े और नए घर की सोचते हैं, बहुत कुछ होते हुए भी और बहुत सारा, ज्यादा बेहतर और उस जैसा मेरे पास क्यों नहीं) की विचारधारा ने भारतीय मानसिकता का बंटाधार कर दिया है, लोगों के पास सुकून है, लेकिन उसको महसूस नहीं कर पा रहे हैं| खुशियां हैं, जिन्हें वे ढूंढ ही नहीं पा रहे हैं, या यह कहें कि उन्होंने इन खुशियों को इसी वजह से खो दिया| बहुत कुछ है, उनके पास वह है जो औरों के पास नहीं लेकिन वे उसे पहचान ही नहीं पा रहे हैं।
प्रतिस्पर्धा अच्छी हो सकती है, लेकिन प्रतिद्वंद्विता मेरी दृष्टि में शायद नहीं। 
जो लोगों का है, वैसा ही या वह भी मेरा हो जाए या मैं सबसे ऊंचा प्रतिष्ठित हो जाऊं के विचार के चलते ही हम हमारे पीछे वालों को लात मार कर आगे बढ़ रहे हैं।
हम अपने दुख से दुखी व सुख से सुखी ना होकर दूसरे के दुख से सुख व सुख से दुखी होकर जी रहे हैं, इसी प्रकार समाज वैमनस्यता की ओर बढ़ जाता है। 
शायद यही समाज में हो रहे अनाचार और सरकारों में हो रहे भ्रष्टाचार का आधार हो।
भौतिकवाद गलत हाथों में पड़ गया है इसे वही बचा सकता है जिसके अंदर करुणा व आध्यात्मिक चिंतन हो।

- डॉ. भूपेंद्र हरदेनिया

रविवार, 12 अप्रैल 2020

स्मृतिशेष-गंगाप्रसाद विमल-काल तुझसे शिकायत

इस क्षति की भरपाई सम्भव नहीं| अकहानी आंदोलन के प्रणेता परम स्नेही, छात्र हितैषी, परम पूज्य, परम श्रद्धेय गुरुजी डाॅ. गंगा प्रसाद विमल जी का इस तरह अचानक चले जाना वज्रपात जैसा है| कोटि कोटि नमन, विनम्र श्रद्धांजलि गुरुदेव| शत् शत् नमन| आपकी हमेशा याद आयेगी|

 वे 80 वर्ष के थे. उनके परिजनों ने बताया कि वे अपने परिवार के साथ श्रीलंका घूमने गए थे. वहां उनकी वैन की टक्कर एक ट्रक से हो गई और तीनों लोगों की मृत्यु हो गई. दुर्घटना में उनका दामाद बुरी तरह घायल हो गये. उनके दामाद दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव उमेश सहगल के पुत्र हैं. तीनों के पार्थिव शरीर को भारत लाया जा रहा है.

श्री विमल केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के निदेशक भी रह चुके थे. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अलावा वे ओस्मानिया विश्वविद्यालय के शिक्षक रह चुके थे. इसके साथ-साथ वे दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से भी जुड़े थे.

गंगा प्रसाद विमल का जन्म 3 जून 1939 को उत्तराखंड के उत्तराकाशी में हुआ था. उन्होंने 1965 में पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी. वे महत्वपूर्ण कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और अनुवादक थे. उनका पहला काव्य संग्रह 1967 में विज्जप नाम से आया था. ‘अपने से अलग’ शीर्षक से उनका पहला उपन्यास 1972 में आया था.

वहीं अगर दूसरी रचनाओं की बात करें तो उनका पहला कहानी संग्रह ‘कोई भी शुरुआत’ 1967 में आया. उन्होंने चंद्रकुंवर बर्थवाल संचयन का संपादन किया और प्रेमचंद एवं मुक्तिबोध पर किताबें लिखीं. उनकी करीब 20 से अधिक पुस्तकें छपीं और उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.

सहज-सरल व्यक्तित्व के मालिक स्मृति शेष विमल जी पिछले साल म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के हीरक जयंती समारोह के मुख्य अतिथि थे.उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि

परम पूज्य गुरुदेव डाॅ. गंगा प्रसाद विमल जी के लिये मेरी एक कविता-

काल तुझसे 

शिकायत है मेरी

क्यों

तू 

छलता आया है,

इस सम्पूर्ण

मानव सृष्टि को

और मुझे,

मुझसे

मेरे अपने

मेरे सपने,

जिसे

हमेशा ही

अपने छलावे से,

तूने छीना है

मुझे,

मुझसे ही

मेरे अपने

और

मेरे सपने|

मेरा 

और उनका

समय 

आने से पहले

एक उत्तम गेंदबाज 

की फेंकी गई तुम्हारी 

 गेंद पर

हमेशा ही चकमा खाकर

हुये हैं खेल से बाहर

मैं 

मेरे अपने

और

मेरे सपने

तूने नहीं होने दिया

साकार

उन सपनों को

जो 

मैंने देखे थे

अपनों के लिये

उलट

घनी

धुंध का

डालकर

पर्दा

कर दिया 

उन्हें ओझल

और बिछड़ गया मैं

और वो मेरे अपने, 

मेरे सपने|

सूनी डायरी के

नीरस पृष्ठों सी 

मेरी जिंदगी

जिस पर 

लिखी जानी थी

कोई खुशी

कुछ प्रेम

कई फ़लसफ़े

कोई तरक्की

या

कुछ खट्टी मीठी यादें

या कुछ इबारतें

लेकिन 

तूने

नहीं बख्शा

जला दिया उन्हें

अपनी प्रचंड अग्नि से

कुछ इस तरह

कि खुलते जाते

जलते जाते

वे पन्ने एक-एक कर

बारी बारी से

एक-एक दिन की तरह

अलिखित

अदिखत|

नहीं चखने दिया

स्वाद 

इसका 

तुमने|

गला दिया

जैसे

पिघलते मोम

सी

टपकती

जिंदगी| 

तेरे

गाल में

समा चुके

मेरे अपने

मेरे सपने

तेरे छल

से छले गये

हमेशा वे

मेरे अपने

मेरे सपने

और 

खुद मैं|

तुम निष्ठुर 

इतने

क्रूर 

कैसे हो सकते हो

क्या तुम्हें

मालूम नहीं

मेरे अपनों का जाना

मेरे जाने जैसा ही है

वह मेरे अपने 

ही

थे

मेरे सपनों में शामिल

कुछ इस तरह कि

वह मेरे अपने नहीं

उनमें मैं ही था

और वो मुझमें

पर

वे नहीं गये कहीं

गया फिर से मैं ही

अब मैं फिर मर चुका हूँ

और हमेशा

मैं ही........

अधूरा जीवन 

लेकर

कई अधूरी ख्वाहिशों के साथ

इसकी शिकायत है

और हमेशा रहेगी

काल तुझसे शिकायत है मेरी


डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया