गुरुवार, 28 मई 2020
चायनीज़ मार्केट से Exit की तैयारी और आर्थिक राष्ट्रवाद
आत्मचेतस् से सम्पृक्त लोकचेतनावादी कविता संग्रह (ऑंख ये धन्य है-नरेन्द्र मोदी, अनुवाद अंजना संधीर) -डॉ0 भूपेन्द्र हरदेनिया (पुस्तक समीक्षा)
मोदी युगीन लोकधर्मिता की स्पष्ट बयॉंवाजी ‘मोदी युग‘- प्रो. संजय द्विवेदी की पुस्तक मोदी युग की समीक्षा
यह लाँकडाउन है,
चल पड़े,
इसे लगते ही
वे मीलों के सफर
पैदल ही तय करने
कोई सौ, कोई पाँच सौ,
कई हजारों की दूरी ,
हालत खस्ता,
पस्त
रक्तल्प धमनियांँ
और शिराएँ
पैर अंकिश्त,
पेट चिपका
पीठ से,
अधोमुख
और
दिल की धड़कन डाउन है,
यह लाॅक डाउन है
झुलसा चेहरा
लथपथ काया
पैरों में
विवाँई
गहरे घाव
छालों के साथ
रक्त का आखिरी
कतरा
बस
दौड़ रहा है
पारे की एक बूँद की तरह
जीर्ण देह में,
एक आस
घर पहुँचने की
मंजिल दूर
विदीर्ण हृदय है,
पर क्या करना उन्हें
जिनके सर पर क्राउन है
यह लाॅक डाउन है
उपार्जन की
ऊम्मीद पर
चले थे
शहर की ओर
छिन गया
सब कुछ,
किसी को बेचनी पडी़
अपनी पायल,
तो किसी को अपने बैल
कइयों को
खुद ही जुतना पडा़,
नौनिहालों
को कंधों बिठाये
वत्सला
और
माँ को पीठ पर
लादे पुत्र
खाली पेट,
एक मुट्ठी
भुँजे चने
कुछ सिके आटे
व
भरपूर उम्मीद
के बल पर
कर रहे मैराथन
उन्हें नहीं पता
पुरस्कार
स्वरूप
जायेगी जान
यह
मौत का कामडाउन है|
यह लाॅक डाउन है|
निस्पृह
तीन दिन बाद
खाना देखकर रो उठती है
बदनसीबी
और दिल
दहल जाता है
हमारा,
अज़हल
इख्तिराई बयानों
को सुनकर
लगता है
खाल उतारकर
चमडा़
रंगने
की तैयारी है,
झूठे भरोसे
आश्वासनों ने
छला उन्हें
वहाँ चर्बआखोर निगहबान है,
यह लाॅक डाउन है|
इंतज़ाम के
अख़लकंद
से मूर्ख बनती
गरीब अवाम,
मधुप की तरह
जिसका
सार शहद
निचोड़कर
छोडा़ गया
झुण्ड में
मवेशियों के माफिक
भूख से रिरियाती हुईं
इस तपती गर्मी में
बदइंतजामी के शिकार
इनकी आफत में जान है,
नींद
कैसे आती होगी
उन्हें
जो इस देश के हुक्मरान है|
यह लाॅक डाउन है| -भूपेन्द्र हरदेनिया
शब्दार्थ-अंकिश्त-जली हुई लकड़ी
निष्पृह-जो मिल जाये उसी पर गुज़ारा करना
इख्तिराई-फर्जी
चर्बआखोर-मुफ्तखोर
अख़लकंद-झुनझुना
अज़हल-मूर्खतम
निगहबान-देखरेख करने वाला
मैं मजदूर हूँ
मैं मजदूर हूँ
आज कंटक हूँ शासन के लिये
शोषकों के लिये अब मुसीबत, सिरदर्द के सिवाय कुछ नहीं|
चिंतकों के लिये विमर्श, उलाहना का मौका
आम जनता के लिये, एक दुख की खबर|
मैं मजदूर हूँ
मेरा सम्बन्ध रहा है सिर्फ़ वेदना से ही
मिलती रही वह सदियों से
किसी भी रूप में
चाहे वह दर्द हो
या दर्दनाक मौत के रूप में|
मैं मजदूर हूँ
बदनसीबी पीछा नहीं छोड़ती मेरा,
भूख-प्यास के बहाने अब कफन बनकर
मंडराकर
आ रही है कहीं भी
चाहे वह पटरी
जिसके सहारे निकला था गाँव,
या उस पर दौड़ती शासन की वह ट्रेन
जिसमें बैठकर
बस पहुँचने ही वाला था
अपने घर,
मैं मजदूर हूँ
अपने ठिकाने पर पहुँचने से
पहले ही हत्या कर दी गई मेरी
फिर किसी साज़िश के तहत
मैं मारा गया हूँ|
काल तुझसे शिकायत है मेरी
एक कविता शिकायत भरी-
(गुरुदेव की याद में)
काल तुझसे शिकायत है मेरी
तू क्यूँ छलता आया है,
इस सम्पूर्ण मानव सृष्टि को
मुझे, मुझसे
मेरे अपने मेरे सपने,
जिसे हमेशा ही अपने छलावे से,
तूने छीना है मुझे,
मुझसे ही मेरे अपने
और मेरे सपने|
मेरा और उनका
समय आने से पहले
एक उत्तम गेंदबाज
की फेंकी गई तुम्हारी
गेंद पर
हमेशा ही चकमा खाकर
हुये हैं खेल से बाहर
मैं, मेरे अपने
और मेरे सपने
तूने नहीं होने दिया साकार
उन सपनों को जो मैंने देखे थे
अपनों के लिये
उलट
घनी धुंध का डालकर पर्दा
कर दिया उन्हें ओझल
और बिछड़ गया मैं
और वो मेरे अपने, मेरे सपने|
सूनी डायरी के नीरस पृष्ठों सी
मेरी जिंदगी
जिस पर लिखी जानी थी
कोई खुशी, कुछ प्रेम
कई फ़लसफ़े
कोई तरक्की
या
कुछ खट्टी मीठी यादें, कुछ इबारतें
लेकिन तूने नहीं बख्शा
जला दिया उन्हें
अपनी प्रचंड अग्नि से
कुछ इस तरह
कि खुलते जाते
जलते जाते
वे पन्ने एक-एक कर, बारी बारी से
एक-एक दिन की तरह
अलिखित-अदिखत|
नहीं चखने दिया स्वाद इसका तुमने|
गला दिया
जैसे पिघलते मोम सी टपकती जिंदगी|
तेरे गाल में समा चुके
मेरे अपने मेरे सपने|
तेरे छल से छले गये
हमेशा वे और खुद मैं भी|
तुम निष्ठुर
इतने क्रूर कैसे हो सकते हो
क्या तुम्हें मालूम नहीं
मेरे अपनों का जाना
मेरे जाने जैसा ही है
वह मेरे अपने ही थे
मेरे सपनों में शामिल
कुछ इस तरह कि
वह मेरे अपने नहीं
उनमें मैं ही था
और वो मुझमें
पर वे नहीं गये कहीं
गया फिर से मैं ही
अब मैं फिर मर चुका हूँ
और हमेशा
मैं ही........
अधूरा जीवन लेकर
कई अधूरी ख्वाहिशों के साथ
इसकी शिकायत है
और हमेशा रहेगी
काल तुझसे शिकायत है मेरी
डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया
दि लाॅकडाउन न होता तो?
शुक्रवार, 22 मई 2020
धरती रोती होगी-कविता
एक कविता धरती माँ पर
धरती रोती होगी,
जब
किया जाता होगा
उसके वृक्ष पुत्रों पर
धारदार हथियार से वार
भेदा जाता होगा
उसके वक्ष स्थल को
गोदा जाता होगा
कटि को|
धरती रोती होगी
जब
होता होगा उसकी
लता-पुत्रियों का चीर हरण
वे पड़ी रहती होंगी औंधी,
मृत,
मूल से कटी हुई|
धरती रोती होगी
जब
नदी रूपी उसकी धमनियों में
बहते हुए जल रूपी
रक्त को
किया जाता होगा प्रदूषित,
पैदा किए जाते होंगे
ब्लाकेज|
धरती रोती होगी
जब
अवैध खदानों और उत्खनन से
चीरा जाता होगा
उसके कलेजे को
करते जाते हैं उसे
मज्जाहीन,
धरती रोती होगी
जब
करते हैं उसकी आवोहवा
को दूषित
नहीं छोड़ते
साँस लेने लायक शुद्ध वायु|
धरती रोती होगी
जब
ट्यूबवेल और बोरवेल
के नाम पर किया जाता होगा
उसके शरीर में कहीं भी सुराख
बेवजह, बेतहाशा, बहाते हैं,
उसके रक्त को|
धरती रोती होगी
जब
धीरे धीरे सूखती जाती हैं
शिराएँ,
होती जाती हैं, रक्तहीन,
खोखली, पोली
और फिर फट जाती होगी
सूखकर|
धरती रोती होगी
जब
हम नहीं लगाते कोई वृक्ष
नहीं करते फिक्र,
उसकी,
उस पर निर्भर जीव-जन्तुओं की,
करते जाते हैं
उनके निवास स्थानों का भी
अतिक्रमण
नहीं छोड़ते
चींटियों के भी रहने लायक
कोई जगह|
धरती
रोती होगी
जब हम नहीं समझते
प्यार को, अहसास को,
रिश्तों को, सम्बन्धों को,
करुणा और दया को|
जाति, धर्म, राजनीति
के नाम पर करते रहते
अपमानित,
लड़ते-लडा़ते रहते सदा
कर रक्तरंजित
एक दूसरे को,
हमेशा
अपनी कुटिलता, चालाकियों से
समझते रहते हैं,
स्वयं को बहुत शातिर
करते रहते हैं,
एक दूसरे से छलावा,
स्वार्थ के वशीभूत होकर
करते हैं रिश्तों को तारतार
मानवता को शर्मसार|
लेकिन
आज
धरती नहीं रो रही है,
वह दिखा रही है
अब अपने रंग,
कर रही प्राकृतिक न्याय|
मिल रही
करनी की पूर्ण सजा
घर में बंद मानव को
जो बहुत दुखी है,
अपने भविष्य को लेकर,
जिसने नहीं की
पृथ्वी के भविष्य की चिंता
कभी,
धरती आज बेहद खुश है
दिख रहा हिमगिरि साफ
मीलों दूर से,
कर रहे मयूर नृत्य,
इंसानी निवासों के नज़दीक
विचरण करते जंगली जीव
याद करतेअपनी पुरानी स्मृतियांँ
यह उनका भी, घर रहा होगा कभी,
जिसे मानव ने लिया छीन,
आज वह भी कैद है
झाँक रहा खिड़की से ही
बेबस होकर
अपने किये पर
पछताकर|
प्रकृति खिलखिला रही है|
अब
मानव का हस्तक्षेप
कम हो गया है|
-डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया
बुधवार, 13 मई 2020
जिंदगी एक झूला है
ज़िंदगी एक झूला है साहब
अगर पीछे जाए
तो डरो मत
वह आगे भी आयेगा
वह जितना पीछे जायेगा
उतना ही आगे आयेगा
उसी वेग से
बस हौसला रख
रख यकीं
उस ऊपर वाले पर
और करता रह अपना काम
सहजता से,
वे मोटे दरख़्त
उनके पुष्पजों
के मानिंद
जो झेल कर झंझावातों को
हिलते रहते हैं खुशी से
और गिरकर भी उग आते हैं
कई बार उसी जमीं पर ,
बस जज़्बा रख
जैसे करती रहती हैं
नन्हीं चीटिंयाँ अपने अंडों
और अपने आहार की
उचित व्यवस्था
उठाये रहती हैं उनका भार
इधर से उधर, उधर से इधर,
वह रौंधी जा सकती
किसी के पैरों तले
फिर भी करती रहती है
अपना काम
भयमुक्त होकर
बस हिम्मत रख
अमृता
की लताएँ
प्रतिकूल मौसम में
पात हीन होकर भी
रहती है पेड़ों पर सवार
अपनी ऊर्जा को करती रहती है
सिंचित
और फिर हरी भरी हो जाती हैं
बनती हैँ रोग मुक्ति का उपाय|
बस भाव रख
होते हैं कई बार
कई काम
धीरे-धीरे
धीरज से
बस धैर्य रख
हमेशा से दुनिया
उम्मीदों पर
कायम रही है
बस उम्मीद रख
दैदीप्यमान नक्षत्र
गृह, तारागण
जिनकी चमक
ग्रहण से कम हो
जाती है,
लेकिन प्रतिभा कहाँ
छुपती है
अधिक समय तक
वे निकल आते हैं
फिर
अपनी तेजोमयता
और
शीतलता के साथ
बस चाहत रख
कहर फैलता है
तो फैलने दे,
फैला है
यह हर युग में,
और
हर बार-अमानव
इसे
फैलाते रहेंगे,
मानव बन
रख दूरियां
सम्भल कर चल
तैयारी रख
निकल
बस सावधानी रख
सूखी लकड़ी नहीं है तू
जो टूट कर गिर जायेगा
समय का इंतजार कर
झूले के वेग की तरह
ही
सूद समेत
सब मिल जायेगा,
बस आस रख
जिंदगी एक झूला है साहब
पीछे जायेगा
तो आगे भी ज़रूर आयेगा|
उसी वेग से
हवा की तरह
हल्का होकर|
-डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया
रविवार, 10 मई 2020
माँ
शुक्रवार, 8 मई 2020
औरंगाबाद में हुए एक ट्रेन हादसे में 16 मजदूरों की मौत हुई है। इस हृदय विदारक घटना पर मेरी एक कविता-
गुरुवार, 7 मई 2020
भौतिकवाद
रविवार, 12 अप्रैल 2020
स्मृतिशेष-गंगाप्रसाद विमल-काल तुझसे शिकायत
इस क्षति की भरपाई सम्भव नहीं| अकहानी आंदोलन के प्रणेता परम स्नेही, छात्र हितैषी, परम पूज्य, परम श्रद्धेय गुरुजी डाॅ. गंगा प्रसाद विमल जी का इस तरह अचानक चले जाना वज्रपात जैसा है| कोटि कोटि नमन, विनम्र श्रद्धांजलि गुरुदेव| शत् शत् नमन| आपकी हमेशा याद आयेगी|
वे 80 वर्ष के थे. उनके परिजनों ने बताया कि वे अपने परिवार के साथ श्रीलंका घूमने गए थे. वहां उनकी वैन की टक्कर एक ट्रक से हो गई और तीनों लोगों की मृत्यु हो गई. दुर्घटना में उनका दामाद बुरी तरह घायल हो गये. उनके दामाद दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव उमेश सहगल के पुत्र हैं. तीनों के पार्थिव शरीर को भारत लाया जा रहा है.
श्री विमल केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के निदेशक भी रह चुके थे. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अलावा वे ओस्मानिया विश्वविद्यालय के शिक्षक रह चुके थे. इसके साथ-साथ वे दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से भी जुड़े थे.
गंगा प्रसाद विमल का जन्म 3 जून 1939 को उत्तराखंड के उत्तराकाशी में हुआ था. उन्होंने 1965 में पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी. वे महत्वपूर्ण कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और अनुवादक थे. उनका पहला काव्य संग्रह 1967 में विज्जप नाम से आया था. ‘अपने से अलग’ शीर्षक से उनका पहला उपन्यास 1972 में आया था.
वहीं अगर दूसरी रचनाओं की बात करें तो उनका पहला कहानी संग्रह ‘कोई भी शुरुआत’ 1967 में आया. उन्होंने चंद्रकुंवर बर्थवाल संचयन का संपादन किया और प्रेमचंद एवं मुक्तिबोध पर किताबें लिखीं. उनकी करीब 20 से अधिक पुस्तकें छपीं और उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.
सहज-सरल व्यक्तित्व के मालिक स्मृति शेष विमल जी पिछले साल म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के हीरक जयंती समारोह के मुख्य अतिथि थे.उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि
परम पूज्य गुरुदेव डाॅ. गंगा प्रसाद विमल जी के लिये मेरी एक कविता-
काल तुझसे
शिकायत है मेरी
क्यों
तू
छलता आया है,
इस सम्पूर्ण
मानव सृष्टि को
और मुझे,
मुझसे
मेरे अपने
मेरे सपने,
जिसे
हमेशा ही
अपने छलावे से,
तूने छीना है
मुझे,
मुझसे ही
मेरे अपने
और
मेरे सपने|
मेरा
और उनका
समय
आने से पहले
एक उत्तम गेंदबाज
की फेंकी गई तुम्हारी
गेंद पर
हमेशा ही चकमा खाकर
हुये हैं खेल से बाहर
मैं
मेरे अपने
और
मेरे सपने
तूने नहीं होने दिया
साकार
उन सपनों को
जो
मैंने देखे थे
अपनों के लिये
उलट
घनी
धुंध का
डालकर
पर्दा
कर दिया
उन्हें ओझल
और बिछड़ गया मैं
और वो मेरे अपने,
मेरे सपने|
सूनी डायरी के
नीरस पृष्ठों सी
मेरी जिंदगी
जिस पर
लिखी जानी थी
कोई खुशी
कुछ प्रेम
कई फ़लसफ़े
कोई तरक्की
या
कुछ खट्टी मीठी यादें
या कुछ इबारतें
लेकिन
तूने
नहीं बख्शा
जला दिया उन्हें
अपनी प्रचंड अग्नि से
कुछ इस तरह
कि खुलते जाते
जलते जाते
वे पन्ने एक-एक कर
बारी बारी से
एक-एक दिन की तरह
अलिखित
अदिखत|
नहीं चखने दिया
स्वाद
इसका
तुमने|
गला दिया
जैसे
पिघलते मोम
सी
टपकती
जिंदगी|
तेरे
गाल में
समा चुके
मेरे अपने
मेरे सपने
तेरे छल
से छले गये
हमेशा वे
मेरे अपने
मेरे सपने
और
खुद मैं|
तुम निष्ठुर
इतने
क्रूर
कैसे हो सकते हो
क्या तुम्हें
मालूम नहीं
मेरे अपनों का जाना
मेरे जाने जैसा ही है
वह मेरे अपने
ही
थे
मेरे सपनों में शामिल
कुछ इस तरह कि
वह मेरे अपने नहीं
उनमें मैं ही था
और वो मुझमें
पर
वे नहीं गये कहीं
गया फिर से मैं ही
अब मैं फिर मर चुका हूँ
और हमेशा
मैं ही........
अधूरा जीवन
लेकर
कई अधूरी ख्वाहिशों के साथ
इसकी शिकायत है
और हमेशा रहेगी
काल तुझसे शिकायत है मेरी
डाॅ. भूपेन्द्र हरदेनिया




